*पाठकों के लेख। : रेणू रेणू*


हम लगभग हर बात जानते हैं, और हमेशा से जानते हैं लेकिन दरअसल समस्या यही है कि बस ज़िंदगी भर करते नहीं, बल्कि इंतज़ार करते हैं कि कब हमें वो बात ढंग से समझ आएगी, और हम उसे फॉलो करना शुरू करेंगे। मैं हमेशा से जानती थी कि लोगों की बातों और आपके बारे में कही गयी टिप्पणियों को आपको निजी तौर पर लेकर अपने आपको परेशान नहीं करना चाहिए, क्यूँकि लोग अपनी समझ, परवरिश और माहौल के हिसाब से आपको जज करते हैं, और अपने विचार कहते हैं लेकिन इस से आप वैसे नहीं हो जाते हैं। मैं हमेशा से जानती थी ये बात और इसीलिए ज़्यादातर मैं अवॉयड करती रही हूँ ऐसे लोगों को और उनकी बातों को जो पसंद नहीं, या जो मुझे जज करते हैं. नॉर्मली मैं पर्सनली नहीं लेती और बिना लोड लिए आगे बढ़ जाती हूँ क्यूँकि मेरे लिए मेरे मन की शांति सबसे ज़्यादा ज़रूरी है। स्वभाव से शांत और अंतर्मुखी हूँ और रही हूँ तो लड़ाई कर लेना, अपशब्द कहना, चीखना-चिल्लाना कर नहीं पाती और मुझे आता भी नहीं, इसीलिए बस शांति भंग करने वालों को अनसुना कर आगे बढ़ लेती हूँ। बातों को पर्सनल तौर पर लेकर क्यूँ अपनी प्रोडक्टिविटी को प्रभावित करूँ, क्यूँ अपने वर्कआउट, रीडिंग, और काम पर असर पड़ने दूँ. मेरे लिए ये सब ज़्यादा ज़रूरी है. किसी और के भीतर के कचरे से निकली बातों से मैं अपना मन क्यूँ ख़राब होने दूँ। मैं आपके कहे को व्यक्तिगत तौर पर लूँ, और अपने आपको परेशान करके टेंशन पाल लूँ, तो ऐसा तो कतई नहीं है। और इसीलिए मुझे फ़र्क़ भी नहीं पड़ता कि किसने क्या और कितना बुरा कहा मुझे। यहाँ तक कि पर्सनल ज़िंदगी में भी बिना लोड लिए आगे बढ़ जाती हूँ, लेकिन फ़िर भी कभी-कभी रिलेशन्स-सर्कल में लोड ले लिया करती थी। किसी के द्वारा की गई बात या टिप्पणी या बात का और पर्सनल ले लिया करती थी, लेकिन थोड़े समय पहले इन सब मानसिक तनाव से लगभग छुटकारा पा लिया है। अब लगभग 99% बातों में मैंने बातों और चीज़ों को पर्सनल तौर पर लेना बंद कर दिया है, फ़िर चाहे कुछ हो, या पर्सनल. मैं नेगेटिव बातों को उनका ख़ुद का फ्रस्ट्रेशन समझती हूँ, और आगे बढ़ जाती हूँ। हालाँकि दया आती है लोगों पर कि भीतर कितना टॉक्सिक लिए घूम रहे, लेकिन ख़ुशी इस बात की, कि उनकी कोशिश के बावजूद वो मेरी शांति भंग नहीं कर पाते। इतनी सी ज़िंदगी में हम अपने रिश्तेदारों, घरवालों, दोस्तों, कलीग्स, वग़ैरह न जाने कितनों की बातें पर्सनल तौर पर लेते हैं और कुढ़ने लगते हैं, ख़ुद का मन, और शरीर दोनों ख़राब करते हैं. थोड़ा चिल कीजिए लाइफ़ में, और लोगों को कहने दीजिए. उनके अपने कारण हैं. या तो उनके कारण समझिए, या फ़िर आगे बढ़िए बिना टेंशन. काहे इतना लोड लेना ।