चार साल के कार्यकाल के बाद कहां खड़े हैं भाजपा और जयराम
चार साल के कार्यकाल के बाद कहां खड़े हैं भाजपा और जयराम
2019-20 कि कैग रिपोर्ट से सरकार पर उठे गंभीर सवाल
एडीबी के कर्ज से बनी संपत्तियां ऑपरेशनल होने से पहले ही प्राइवेट हाथों में क्यों?
जयराम के अधिकांश मंत्रियों का विवादित होना क्या एक संयोग है या कुछ और…
शिमला/शैल। जयराम सरकार के सत्ता में चार साल पूरे होने जा रहे हैं इस अवसर पर मंडी में एक राज्य स्तरीय आयोजन किया जा रहा है। प्रधानमंत्री ने इसमें शामिल होने की हां भी कर दी है। स्वाभविक है कि जब प्रधानमंत्री इस आयोजन में शामिल होंगे तो प्रदेश से ही ताल्लुक रखने वाले राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा और केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर भी इसमें शामिल होंगे ही। यह आयोजन उस समय हो रहा है जब अभी कुछ दिन पहले ही हुए चारों उपचुनाव भाजपा और जयराम सरकार हार गयी है। बल्कि इस हार के बाद प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन के कयास चल पड़े थे। क्योंकि भाजपा गुजरात, उत्तराखंड और कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन बड़े छोटे-छोटे मुद्दों पर कर चुकी थी। लेकिन अभी तक प्रदेश की सरकार और संगठन किसी में भी कुछ भी बदलाव नहीं हो पाया है। कहा यह जा रहा है कि यदि मुख्यमंत्री जयराम ने हार के लिए अपनी तत्कालिक प्रतिक्रिया में महंगाई को जिम्मेदार न ठहराया होता और इस प्रतिक्रिया के बाद पेट्रोल और डीजल की कीमतों में मोदी सरकार ने कमी न की होती तो शायद स्थितियां कुछ और होती। फिर इसी के साथ उत्तर प्रदेश के चुनाव को जोड़कर यह तर्क सामने आया है कि उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणामों के बाद ही राज्यों की समस्याओं पर ध्यान दिया जायेगा। इस तरह जो दो-तीन माह का समय जयराम को मिल गया है उसमें वह अपनी कार्यशैली में कितना सुधार कर पाते हैं उस पर हाईकमान से लेकर प्रदेश के हर आदमी की नजर रहेगी।
किसी भी मुख्यमंत्री और उसकी सरकार के लिए सबसे बड़ी कसौटी यही होती है कि क्या वह सत्ता में वापसी कर पायेगी? यदि हार भी होती है तो वह शर्मनाक नहीं होनी चाहिये। इस गणित में अब तक रही कांग्रेस और भाजपा की सरकारों में कोई भी मुख्यमंत्री सत्ता में वापसी नही कर पाया है। इसलिए यदि जयराम भी सत्ता में वापसी नहीं कर पाते हैं तो यह कोई अनहोनी नहीं होगी। वीरभद्र और प्रेम कुमार धूमल पर यह आरोप लगता रहा है कि उनके परिवारों का शासन प्रशासन में दखल ज्यादा बढ़ गया था इसलिए वह वापसी नहीं कर पाये। परंतु जयराम के परिवार से तो कोई भी राजनीति में नहीं है। इसके बावजूद भी यदि जयराम सत्ता में वापसी नहीं कर पाते हैं तो वीरभद्र और धूमल परिवार भी इस आरोप से मुक्त हो जाते हैं। उस सूरत में यह आरोप मुख्यमंत्री की अपने सलाहकारों की टीम और उनकी अपनी प्रशासनिक समझ पर ही आकर टिकेगा।
इस मानक पर यदि जयराम के चार वर्षों के कार्य का आकलन किया जाये तो इसका सबसे बड़ा प्रमाणिक दस्तावेज कैग की वर्ष 2019-20 की इस विधानसभा सत्र में आई रिपोर्ट हो जाती है। इस रिपोर्ट में जयराम सरकार पर सबसे बड़ा आरोप लगा है कि उसने जनहित से जुड़ी 96 योजनाओं पर एक पैसा भी खर्च नहीं किया और न ही खर्च न करने का कोई कारण ही बताया है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कोई भी योजना एक करोड़ से कम की नहीं थी। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि इसी अवधि में सरकार का कर्ज 62000 करोड़ से पार गया है। स्मरणीय है कि 9 मार्च 2018 के अपने पहले बजट भाषण में मुख्यमंत्री ने सदन में यह कहा है कि उनकी सरकार को 46000 करोड़ का कर्ज विरासत में मिला है। सीएजी की रिपोर्ट और मुख्यमंत्री के भाषण से यह सामने आता है कि इस सरकार को 8000 करोड़ का कर्ज प्रतिवर्ष लेना पड़ रहा है। यदि इतना कर्ज लेकर भी जनहित की 96 योजनाओं पर इस सरकार में कोई पैसा ही खर्च नहीं किया है तो कार्यकुशलता पर इससे बड़ा सवाल और क्या हो सकता है। कैग के इस प्रमाण पत्र के बाद शायद विपक्ष को सरकार पर हमलावर होने के लिये और किसी बारूद की जरूरत नहीं रह जाती है। इसी प्रमाण पत्र के साथ जब एडीबी के कर्ज से सिराज बड़ागांव और क्यारीघाट में बनी संपत्तियों को ऑप्रेशनल होने से पहले ही प्राइवेट सेक्टर को दे देने का सच सामने आयेगा तो फिर कांग्रेस के साठ/आठ के दावे को पूरा होने से कौन रोक पायेगा।
इस वस्तुस्थिति में राजनीतिक विश्लेषकों के सामने एक बड़ा सवाल यह भी आ रहा है कि यह सब कुछ ऐसे घट गया कि जयराम को इसका पता ही नहीं चल पाया या फिर अपनी कुर्सी पक्की करने के लिए यह सब कुछ घटने दिया गया। इस सवाल की पड़ताल करने के लिए कुछ तथ्यों पर नजर डालना आवश्यक हो जाता है। 2017 का चुनाव भाजपा ने धूमल को मुख्यमंत्री घोषित करके लड़ा था। लेकिन संयोगवश पार्टी को तो बहुमत मिल गया और धूमल अपनी पूरी टीम के साथ हार गये। इस हार के बाद भी विधायकों के एक बड़े वर्ग की ओर से उन्हें मुख्यमंत्री बनाने की मांग और उनके लिये सीट खाली करने की पेशकश तक हुई। उस समय पार्टी में दूसरे वरिष्ठ लोगों में महेंद्र सिंह, जे.पी. नड्डा और सुरेश भारद्वाज आते थे। जयराम वरिष्ठता में इन सबके बाद थे। महेंद्र सिंह आर एस एस से ताल्लुक नहीं रखते और इसी गणित से में बाहर हो गये। नड्डा का नाम भी यहां तक आ गया था कि उनके समर्थकों ने तो मिठाईयां बांट दी और रास्ते से वापस हुए। इस गणित में जयराम फिर बैठ गये और मुख्यमंत्री बन गये। लेकिन इन दावेदारों का डर हर समय सिर पर मंडराता रहा। इस डर से बाहर आने के लिए सबसे पहले धूमल को शिमला से बाहर किया गया। उसके बाद हर जिले के बड़े नेता और संघ के नजदीकीयों को विवादित बनाने की कवायद शुरू हुई। मुख्यमंत्री के अपने ही कार्यालय के धर्मा-धर्माणी को लेकर एक पत्र वायरल हो गया। उसके बाद दूसरे पत्र में परमार और बिंदल तथा रविन्द्र रवि निशाने पर आ गये। इसी दौरान अनिल शर्मा और महेंद्र सिंह में मोर्चा खुल गया। महेंद्र सिंह सभी के निशाने पर आ गये। कांगड़ा में उद्योग मंत्री विक्रम भी पत्र बम के शिकार हुये। सरवीन चौधरी के खिलाफ विजय मनकोटिया आ गये। इंदु गोस्वामी को भी संगठन और सरकार के खिलाफ पत्र लिखना पड़ा। उपचुनाव में सुरेश भारद्वाज राजीव बिंदल और राकेश पठानिया सभी के चुनावी प्रबंधन कौशल की हवा निकल गयी। अभी नड्डा के अपने ही गृह जिले में उसके अपने ही लोग उससे नहीं मिल पाये और उल्टे मामलों के शिकार बन गये।
इस तरह यदि पूरी वस्तु स्थिति पर निष्पक्ष नजर डालें तो भाजपा का हर वह नेता तो देर सवेर नेतृत्व का दावेदार हो सकता था इस समय किसी न किसी कारण से विवादितों की कतार में आ गया है। इस सब में आज भी अकेले जयराम ही उन नेताओं में बचा है जो स्वयं ज्यादा विवादित नहीं है। भले ही इस सब की कीमत संगठन को चुकानी पड़ेगी लेकिन आज जयराम ने अपने को वहां लाकर खड़ा कर दिया है जहां उसका कोई विकल्प पार्टी के पास उपलब्ध नहीं है। जिस तरह से इस समय कांगड़ा को तीन जिलों में बांटने की योजना बन रही है और कांगड़ा का सारा नेतृत्व इस पर चुप्पी साधे बैठा है उसको क्या राजनीति की एक बड़ी शातिर चाल नहीं माना जाना चाहिए क्योंकि इसके बाद कांगड़ा का सबसे बड़ा जिला होने का टैग खत्म हो जायेगा। क्या उसका नुकसान कांगड़ा के वर्तमान नेताओं को नहीं होगा ।बलदेव शर्मा
