विजय दिलवाने वाली मां बगलामुखी का इतिहास पढ़िए और आशीर्वाद प्राप्त कीजिए
*ॐ ह्रीं बगलामुखी सर्व दुष्टानाम वाचं मुखम पदम् स्तम्भय । जिव्हां कीलय बुद्धिम विनाशय ह्रीं ॐ स्वाहा ।। .*
[ *जय माता दी जय माता दी जय माता दी** 💐💐💐💐🌹🙏
*ॐ ऐं ह्लीं क्लींम चामुंडायै विच्चे!!* 💐🌹🌹💐🙏🙏🙏🌹💐
बी के सूद मुख्य संपादक

हिमाचल प्रदेश देवताओं व ऋषि-मुनियों की तपोस्थली रहा है। जिला कांगड़ा के वनखण्डी में स्थित माँ श्री बगलामुखी का सिद्ध शक्तिपीठ है। वर्ष भर यहाँ श्रद्धालु मन्नत माँगने व मनोरथ पूर्ण होने पर आते-जाते रहते हैं। माँ बगलामुखी का मंदिर ज्वालामुखी से लगभग 22 किलोमीटर दूर ‘वनखंडी’ नामक स्थान पर स्थित है।
सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा का ग्रंथ जब एक राक्षस ने चुरा लिया और पाताल में छिप गया तब उसके वध के लिए मां बगलामुखी की उत्पत्ति हुई। पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान मां का मंदिर बनाया और पूजा अर्चना की। पहले रावण और उसके बाद लंका पर जीत के लिए श्रीराम ने शत्रुनाशिनी मां बगला की पूजा की और वियज पाई। मां को पीतांबरी भी कहा जाता है। इस कारण मां के वस्त्र, प्रसाद, मौली और आसन से लेकर हर कुछ पीला ही होता है। युद्ध हो या राजनीति या फिर कोर्ट-कचहरी के विवाद, मां के मंदिर में यज्ञ कर हर कोई मन वांछित फल पाता है।
माता बगलामुखी दस महाविद्याओं में आठवीं महाविद्या हैं। इन्हें माता पीताम्बरा भी कहते हैं। ये स्तम्भन की देवी हैं। सम्पूर्ण सृष्टि में जो भी तरंग है वो इन्हीं की वजह से है। सारे ब्रह्माण्ड की शक्ति मिल कर भी इनका मुकाबला नहीं कर सकती है। भारत में माँ बगलामुखी के तीन ही प्रमुख ऐतिहासिक मंदिर माने गए हैं जो क्रमश: दतिया (मध्यप्रदेश), कांगड़ा (हिमाचल) तथा नलखेड़ा जिला शाजापुर (मध्यप्रदेश) में हैं। तीनों का अपना अलग-अलग महत्व है। आज हम बात कर रहे है हिमाचल प्रदेश के काँगड़ा जिले के बगलामुखी मंदिर के बारे में…
बगलामुखी मंदिर कांगड़ा जिले के एक प्रमुख पर्यटन स्थल है। सैकड़ों भक्त प्रतिदिन माँ बगलामुखी जी की पूजा करने आते हैं। माता बगलामुखी दस महाविद्याओं में आठवीं महाविद्या हैं। बगलामुखी मंदिर हिमाचल प्रदेश में कांगड़ा जनपद के बनखंडी क़स्बा में स्थित प्रसिद्ध शक्तिपीठ है। यह मंदिर हिन्दू धर्म के लाखों लोगों की आस्था का केन्द्र है। बगलामुखी का यह मंदिर महाभारत कालीन माना जाता है। पांडुलिपियों में माँ के जिस स्वरूप का वर्णन है, माँ उसी स्वरूप में यहाँ विराजमान हैं। ये पीतवर्ण के वस्त्र, पीत आभूषण तथा पीले रंग के पुष्पों की ही माला धारण करती हैं। माँ बगलामुखी वनखंडी में विभिन्न राज्यों से लोग आकर अपने कष्टों के निवारण के लिए हवन, पूजा-पाठ करवाकर माता का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
बगलामुखी मंदिर का इतिहास
यह माना जाता है कि इस मंदिर की स्थापना द्वापर युग में पांडवों द्वारा अज्ञातवास के दौरान एक ही रात में की गई थी, जिसमें सर्वप्रथम अर्जुन एवं भीम द्वारा युद्ध में शक्ति प्राप्त करने तथा माता बगलामुखी की कृपा पाने के लिए विशेष पूजा की गई थी। कालांतर से ही यह मंदिर लोगों की आस्था व श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है। वर्ष भर असंख्य श्रद्धालु, जो ज्वालामुखी, चिंतापूर्णी, नगरकोट इत्यादि के दर्शन के लिए आते हैं, वे सभी इस मंदिर में आकर माता का आशीर्वाद भी प्राप्त करते हैं। इसके अतिरिक्त मंदिर के साथ प्राचीन शिवालय में आदमकद शिवलिंग स्थापित है, जहाँ लोग माता के दर्शन के उपरांत शिवलिंग पर अभिषेक करते हैं
हिमाचल प्रदेश देवताओं व ऋषि-मुनियों की तपोस्थली रहा है। जिला कांगड़ा के वनखण्डी में स्थित माँ श्री बगलामुखी का सिद्ध शक्तिपीठ है। वर्ष भर यहाँ श्रद्धालु मन्नत माँगने व मनोरथ पूर्ण होने पर आते-जाते रहते हैं। माँ बगलामुखी का मंदिर ज्वालामुखी से लगभग 22 किलोमीटर दूर ‘वनखंडी’ नामक स्थान पर स्थित है।
मंदिर में हवन करवाने का है विशेष महत्व
माना जाता है कि देवी बगलामुखी मंदिर में हवन करवाने का विशेष महत्व है। इससे मुसीबतों से छुटकारा पाने के साथ ही बीमारियां दूर होती है और दुश्मनों पर जीत मिलती है। युद्ध, राजनीति से जुड़े मामले या फिर कोर्ट-कचहरी के विवादों में जीत पाने के लिए इस मंदिर में देवी की विशेष पूजा करवाई जाती है। कलयुग में इस देवी को ब्रम्सत्र दायिनी कहा जाता है। यह एक दम से ही प्रभाव देती है।
पीला रंग होने से इन्हें कहते हैं पितांबरा
पांडुलिपियों में देवी के जिस रूप का जिक्र है। उसी रूप में देवी बगलामुखी यहां विराजमान हैं। बनखंडी गांव के इस बगलामुखी मंदिर के पुजारी ने बताया कि देवी हल्दी रंग के जल से प्रकट हुई थीं। पीले रंग के कारण मां को पीतांबरा देवी भी कहते हैं। इन्हें पीला रंग बहुत प्रिय है, इसलिए इनकी पूजा में पीले रंग की चीजों का इस्तेमाल किया जाता है। देवी बगलामुखी का रंग सोने के समान पीला होता है।
भगवान विष्णु और ब्रह्मा ने की देवी की पूजा
माता बगलामुखी दस महाविद्याओं में 8वीं हैं। खासतौर से इनकी आराधना दुश्मनों पर जीत पाने के लिए की जाती है। धर्म ग्रंथों के मुताबिक माता बगलामुखी की आराधना सबसे पहले ब्रह्माजी और भगवान विष्णु ने की थी। इसके बाद भगवान विष्णु के अवतार परशुराम ने देवी बगलामुखी की पूजा करके कई लड़ाईयां जीती थी।
मान्यता: पांडवों ने की मंदिर की स्थापना
द्रोणाचार्य, रावण, मेघनाद इत्यादि सभी महायोद्धाओं द्वारा माता बगलामुखी की आराधना करके अनेक युद्ध लड़े गए। मंदिर के पुजारी बताते हैं कि इस मंदिर की स्थापना द्वापर युग में पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान की थी। इसके बाद अर्जुन और भीम ने शक्ति पाने के लिए यहां पूजा की थी।
जय माता दी