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*पाठकों के लेख: राजनीतिक विश्लेषण :-उमेश बाली द्वारा*
कांग्रेस और राजनीति
एक राष्ट्रीय स्तर का राजनीतिक दल जिसने गांधी से नंगे पांव और नंगे बदन संघर्ष सीखा उसका 403 सीटों से केवल दो प्राप्त करना वास्तव मै शर्मनाक स्थिति है और इसकी नींव 70 के दशक से रख दी गई थी ।
जब तमिलनाडु में क्षेत्रीय पार्टी का उदय हो रहा था तो कांग्रेस ने राजनीतिक जंग लड़ने से पहले वामपंथी विचारधारा के समक्ष जंग हार दी । जब वहां तमिल में लिखी रामायण जिसमें किरदारों को अलग ढंग से पेश किया गया कांग्रेस ने कोई संघर्ष नहीं किया , जब संस्कृत और हिंदी का तिरस्कार हुआ तमिलनाडु में तो कोई संघर्ष नहीं हुआ नतीजा वहां से कांग्रेस समाप्त हो गई ।
करीब उसी समय बंगाल में वामपंथी उदय होने लगे और कांग्रेस ने राजनीतिक तौर पर हथियार डाल दिए केवल खून से सिद्धार्थ शंकर साहिब ने इबारत लिखने की कोशिश की और राजनीति गायब हो गई नतीजा बंगाल वामपंथ के अधीन हो गया । यह बात भी 1970 से और 1980 के बीच की घटनाएं है । उस समय ममता बैनर्जी जवान थी कर्मठ थी और कांग्रेस की युवा नेता थी । ऐसे ही हालात में 1984 के बाद राजीव गांधी प्रधान मंत्री बने । ममता ने अपनी महत्त्वाकांक्षां के लिए वाम दलों से लोहा लेने का फैसला किया लेकिन कांग्रेस ने ममता बैनर्जी को कोई समर्थन दिया । नतीजा ममता पर वामकर्ताओं ने जबर दस्त शारीरिक हमला किया और ममता का जख्मी हालत में इलाज देहली में हुआ । उसके बाद ममता ने क्षेत्रीय दल तृणमूल कांग्रेस बना लिया और कांग्रेस मैदान से निकल गई । बंगाल भी कांग्रेस के हाथ से निकल गया ।ऐसा ही केरल और त्रिपुरा में हुआ । आज़ादी के बाद कांग्रेस कभी भी संघर्ष करती नही देखी गई ।कांग्रेस के अपने समीकरण और आकलन थे और है । यह सोच थी कि मुस्लिम , दलित और कुछ स्वर्ण सदा साथ देते रहेंगे और सत्ता हासिल होती रहेगी ।
कांग्रेस ने मुस्लिम तुष्टिकरण आरम्भ कर दिया मुस्लिम लीग जैसी संप्रदायक पार्टी से भी गठबन्धन किया और मुस्लिम तुष्टि करण की पराकाष्ठा शाहबानो केस में की जब कुछ मुल्लों की खातिर संविधान ही बदल दिया गया । कहां 400 सीट पर काबिज चुनाव आते आते 200 पर सिमट गई । राजीव की हत्या हुई ,नई सरकार बनी लेकिन कांग्रेस ने वी पी सिंह से संघर्ष की बजाय केवल राजनीति चाले चली इससे पहले भी 1980 में भी ऐसा ही किया गया , ऐसा ही पंजाब में भी खूनी खेल की विसात बिछाई लेकिन राजनीतिक संघर्ष नहीं किया । ऐसा ही कश्मीर में भी किया हेरा फेरी से सरकारें बनती रही लेकिन राजनीतक संघर्ष नहीं । सत्ता बचाने के लिए लोकतंत्र का गला तक घोंटा गया आपातकाल के रूप में , सत्ता हासिल करने के लिए राज्य की चुनी हुई सरकारों को 356 लगा कर तोड़ा गया । भ्रष्टाचार को देश की नस नस में फैलने का मौका दिया गया ।
जब की दूसरी ओर दूसरी पार्टियां राजनीतिक रूप से धरातल पर कार्य कर रही थी , संघर्ष कर रही थी । आज की दो सीटों के लिए कांग्रेस खुद जिम्मेदार है या तो हर समुदाय की अलगाव की आलोचना कीजिए ,हर भड़काने वाले की आलोचना करो ।केवल हिंदुओ पर आक्षेप करना बन्द करो।कांग्रेस सत्ता का आनंद लेती रही लेकिन कांग्रेस को राजनीतिक रूप से संघर्ष करना नहीं आता यह विरोध बीजेपी का करना चाहती है लेकिन वास्तव में देश का कर बैठती है ।यह राजनीतिक संघर्ष की बजाय भ्रम फैलाने लगी है , यह भीड़ को आंदोलन समझने लगी है और भीड़ का नेतृत्व करने में ही लगी हुई । किसी भी आपदा की स्थिति में यह देश के साथ खड़ी दिखाई नहीं देती अपितु सरकार को फेल करने में लगी रहती है , जब कि आपदा में आरएसएस और बीजेपी जब विपक्ष में भी थी तो वो देश के साथ खड़ी होती दिखाई पड़ती थी । अंत में जितनी जल्दी कांग्रेस इस बात को समझ लेगी उतना ही कांग्रेस के लिए अच्छा होगा । धन्यवाद ।
