आखिर सरकारी कर्मचारी अधिकारी इतने बुरे क्यों लगते हैं और उनका पेंशन की मांग करना ।।
सोशल मीडिया पर लिखने वाले क़िस्म क़िस्म के लोग हैं उनमें से कुछ ऐसे हैं जो सबसे बड़े निजीकरण के समर्थक हैं , असल मे जो सरकारी नोकरी के लिए ऐड़ी चोटी का जोर लगा चुके होते या तो ओवर ऐज हो गए या कुछ खास कर नहीं कर पाए फिर यह अपने खानदान में किसी की लग जाये इसके लिए मन्नते मांगते फिरते हैं जब उनकी भी नहीं लगती तो यह हर उस इंसान को शक की नज़र से देखते हैं जिनकी लगी हो। आपको बता दूं कि किस तरह के लोग सोशल मेडिया पर लिखते हैं-
1.जिनके पास सरकारी नौकरी है।
2.जो सरकारी नौकरी पाने के लिये जी जान लगा रहे हैं, पढ़ रहे हैं, कॉम्प्टिटिव की प्रेप कर रहे हैं या जी जान लगा चुके हैं अपने ज़माने में, अब फैमिली में किसी की लग जाए इस कोशिश और प्रार्थना में अपनी मुश्किल नौकरी और कम सैलरी से जूझ रहे हैं।
3.जिनके पास न ढंग की नौकरी है न अब्बू अमीर हैं, न चाचा विधायक हैं, न लिखने से ही ज़्यादा कुछ बात बन रही है, लाइक्स चिल्लर में कमेंट्स नोटों में नहीं बदल पा रहे हैं। ‘बे’रोज़गार हैं।
4.जिनको बस लिखना पसन्द है, लिखना जिनका शौक़ है या जुनून है या ज़िन्दगी का अहम हिस्सा इसलिये लिखे जा रहे हैं बाक़ी जोड़ घटाव, हिसाब किताब परे रखकर।
5.जिनको बस टाइमपास करना है। नथिंग सीरियस।
कुछ को जलन इतनी जलन कि बर्दाश्त न हो…….
अपनी लग जाती सरकारी नौकरी तो खुशी से नाच नाच मर जाते। हर बात पर पानी पी पीकर, हाजमोला-गटागट, अनारदाना-हींगोली खा खाकर सरकारी नौकरों को कोसते हैं। इनका वो आलम है कि-
सब के सब सरकारी नौकर मट्ठे हैं, खड़ूस, निखट्टू भी, कामचोर हैं, मुफ़्तख़ोर, भ्रष्टाचारी भी
क्या बिगड़ जाता ए ख़ुदा गर जो एक बार सरकारी नौकरी लग जाए/लग गई होती हमारी भी…..इनमें से कढ़े विरोधी तो वो हैं जो अपने घर में बाप को पेंशन मिलते ही बच्चों को बोलते हैं दादा से पैसे ले ले जाकर।
आधे अपनी लड़कियों को मर्ज़ी से शादी तक इसलिए नहीं करने देते क्योंकि सरकारी नोकरी नहीं है।
ऐसे मतलब परस्त लोगों पर हाथ न पहुंचे थू कोड़ी वाली कहावत सही बैठती है। ज़िन्दगी में अपने हिस्से का संघर्ष कीजिये, अपने लिए मांगिये पर दूसरों के हक़ों पर उंगली मत उठाईये वरना ज़िन्दगी भड़ास, जलन और द्वेष में ही निकल जायेगी।