Himachal

*कयामत की वारिश* :-*उमेश बाली*

1 Tct

कयामत की वारिश

Tct chief editor

बहुत से लोग इस प्रलय को धर्म से जोड़ेंगे , मंदिरो से जोड़ेंगे कुछ भविष्य वक्ता भी आयेंगे । बहुत से पाप से जोड़ेंगे लेकिन मूल कारणों की और न व्यक्ती , न राजनितिक दल और न सरकारें ध्यान देंगी । क्या कोई भी व्यक्ती कार्बन उत्सर्जन की तरफ ध्यान देगा , मजबूरी है कयोंकि पूरे देश में अधिकांश जगह पर घास, प्लास्टिक या अन्य कूड़ा जलाने की जगह निष्पादन के लिए तकनीक का इस्तेमाल ही नही । किसान मजबूर, गांव में आम व्यक्ती भी मजबूर । दूसरी तरफ बड़े कारखानों के जो रसायनिक हैं या कार्बन उत्सर्जक हैं उनके लिए पॉल्यूशन बोर्ड हैं लेकिन निगाह नही हैं । कहीं चिमनियो से निकलते धुएं की परवाह नही । आप हिमाचल के बॉर्डर से देहली की तरफ चलिए आपकों असमान का नीला रंग कहीं दिखाई नहीं देगा । दो घंटे में आपकी पहनी हुई कमीज के कालर पर कार्बन की और मिट्टी की मिली जुली तह दिखाई देने लग जाएगी । दूसरी तरफ रसायनों के द्वारा आप ने देहली में जमुना के उपर झाग तो तैरती देखी है । गंदे नाले आदमी के मल को ढोते हुए पानी में गंदी गैसे मिला रहे हैं । अब एक दृश्य और देखिए सड़कों की अवश्यकता है इसमें कोई शक नही । मेरे जैसा व्यक्ती जो विशेषज्ञ नही है उसे भी मालूम है कि निर्माण से पहाड़ खोखले होंगे और लहासे गिरने लेकिन सरकार के विशेषज्ञ सड़क निर्माण से पहले इस बारे में कोई योजना नहीं बनाते कि कैसे कम से कम नुकसान से पहाड़ों को बचाया जा सकता है । खुदाई के समय ही अनगिनत गिरती मिट्टी को जालों के साथ बांधा जा सकता है पत्थरों को भी साथ में बांधा जा सकता है, बाद में विभाग के द्वारा युद्व स्तर पर पेड़ लगाने का कार्य प्रारंभ हों सकता है । चट्टानों को रोकने के लिए भी रसायनों का प्रबंध हो सकता है । मैं बहुत छोटा था तब से पंडोह से लेकर आउट तक सड़क को हर साल क्षतिग्रस्त होते देखा लेकिन सड़क नीचे से ऊंचाई पर चली गईं लेकिन 55 साल से चट्टानो को नही संभाल पाए आखिर टनलिंग शुरू की गई जो आज से तीस साल पहले हो सकती थीं । बेतरतीब निर्माण नदियों के किनारे पर क्यों नही रोका जाता । घरों के लिए कोई योजना नहीं ताकि नदियों से खनन रोका जा सके । खनन एक प्रकार से नदी से जमीन लेना है जिसे बाद में नदी वापस लेती ही है । नदियों और नालों के मुहाने तंग कर दिए गए हैं । हम स्वयं ही कयामत को आमंत्रित कर रहे हैं । इस कदर कार्बन उत्सर्जन कर रहे हैं कि जलवायु प्रभावित हो चुका है । फिर भी कुछ लोग पटाखों के लिए चिल्लाते हैं ताकि और आहुति डाली जाए । एक और खतरनाक खेल दुनिया के बड़े देशों में चल रहा हैं वो हैं हथियारों का बाजार । हथियार बेचने के लिए दुनियां बांट दी गई हैं और युद्ध रोकने के लिए कोई गंभीरता नही अपितु परदे के पीछे से हथियार बेचने का धंधा है किसी अमेरिका , रूस को वहां होती कार्बन उत्सर्जन की कोई पीड़ा नही । हर देश को हथियारों की दौड़ में शामिल कर दिया गया है । अभी तो शुरुआत है अगले 100 साल में जब मुबई और कोलकाता सहित शहर डूबेंग तब पता चलेगा । पर्यावरण विदों की कोई सुनता नही । हमे कोई भगवान नही आयेंगे बचाने हमे खुद ही हल तलाश करने होंगे , विकास भी हो और नुकसान भी न हो । बादल तो हिमालय में ही फटेंगे कयोंकि बादल यहीं इक्कठे होते हैं , जितना पर्यावरण खराब निचले इलाकों खराब होगा बादल उस जहर को लेकर हिमालय मे ही आयेंगे । इस लिएं कार्बन उत्सर्जन स्वयं भी रोकिए और मैदानी उत्तर भारत में भी रोकिए । हम आने वाली नस्लों को बहुत जल्दी अस्थमा जैसी बीमारियां देने वाले हैं । सावधान हो जाइए प्रकृति के इशारे समझ जाइए ।
सभी पाठको को आजादी मुबारक हो और शुभ कामनाएं ।

Umesh Bali Tct

उबाली ।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button