*तुझे याद करता हूँ माँ :लेखक विनोद शर्मा वत्स*

एक नई रचना
तुझे याद करता हूँ माँ
माँ कौन से आसमानों ने छीन लिया तुझको मुझसे।
पुकारता हूँ पर नज़र नही आती मुझको।
बचपन की यादे
एक चलचित्र की भाँति चलती है।
दिखता सब है
पर छू नही पाती उंगलियां तुझको।
कब सोऊ कब जागू
किसी को परवाह नही मेरी।
कब खाया नही खाया
किसी को चिंता नही मेरी
तू थी
तो सब थे रिश्तें नाते
अब सब भूले बाते।
तेरे हाथो की
पता नही कितनो ने रोटियां खाई।
कितनो ने
तेरे घर में महीनों शरण पाई।
सब तेरे साथ
खत्म हो गई बाते।
तू क्या गई
दुखो की थमती नही बरसाते।
सुबह उठाना जगाना
गर्म चाय बिस्तर पे लाना
बस्ते में
किताबे पूरी है के नही
ये चेक करके बताना
तू माँ नही टीचर थी
घर पे तेरे डर से
पढ़ते थे घर पे।
कभी खुद डराती
कभी पिता की धमकी दिखाती
सो जाओ
कल पेपर हैं
इसलिए समय से पहले उठाती।
कितनी यादे याद करू तेरी
तू वो किताब हैं
जो भूली नही आँखे मेरी
आज अकेला
किताबो से लड़ता हूँ
सवालों से लड़ता हूँ ख़यालो से लड़ता हूँ
जिंदगी कितनी जीवट हैं
ये सोच कर
तुझे याद करता हूँ
ये सोच कर तुझे याद करता हूँ

विनोद शर्मा वत्स