
*Editorial*पालमपुर या हिमाचल के किसी भी शहर की सरकारी संपत्तियों का युक्तिकरण होना ही चाहिये*

सिविल हॉस्पिटल की पुराना दंत चिकित्सा भवन के बारे में तथा वेटरनरी हॉस्पिटल जब यह नया भवन बना नहीं था ,तब भी मैंने बहुत बड़ी-बड़ी न्यूज़ लिखी थी लेकिन बात वही होता है कि नक्कारखाने में तूती की कौन सुनता है मैंने स्वयं वेटरनरी हॉस्पिटल में जाकर पता किया था कि वहां पर कितनी ओपीडी होती है वहां पर 10 से 15 ओपीडी होती हैं और वह भी कुत्तों की पेट्स की।
अब आप बताइए इस भरे बाजार में कौन अपनी गाय बैल भैंस लेकर आएगा इस भीड़ भरे बाजार में इंसानों का चलना मुश्किल है फिर जानवरों को लेकर कोई कैसे यहां पर आएगा ।इस विषय पर मैंने उस वक्त के स्थानीय विधायक से भी बात की थी कि सर यहां पर बेसमेंट में और ग्राउंड फ्लोर पर पार्किंग बना दी जाए, ऊपर के फ्लोरस पर दुकानें निकाल दी जाए तो नगर परिषद को लाखों की हर महीने इनकम हो सकती है जिससे हमारे सिविल हॉस्पिटल की बिजली पानी सफाई का खर्चा बहुत आराम से निकल सकता है यहां तक की कुछ स्टाफ का खर्च भी निकल सकता है नए equipment आ सकते हैं। और हॉस्पिटल की बहुत अच्छी तरह से देखभाल हो सकती है परंतु ना जाने कौनसी प्रशासनिक मजबूरियां थी कि फिर भी यहां पर पुराना भवन को काटकर नया भवन बना दिया गया आप आज भी जा कर देखिए यहां पर कोई ज्यादा ओपीडी नहीं होती है। उस समय के एक डॉक्टर मुझसे उलझ पड़े थे कि बड़े पत्रकार बनते हो हम लोग बेवकूफ नहीं है जो यहां बैठे हैं जिसका सीधा सा मतलब है कि वह लोग नहीं चाहते थे कि यहां से हॉस्पिटल शिफ्ट हो जबकि वेटनरी कॉलेज में जिला कांगड़ा का सबसे बड़ा हॉस्पिटल है।
इसी तरह से दो-तीन बार मेरे द्वारा यह आर्टिकल भी लिखा है कि हॉस्पिटल के फ्रंट साइड में एक बहुत बड़ी खाली स्पेस छोड़ा गया है जिसमें कम से कम 20 दुकानें निकल सकती हैं और उन 20 दुकानों के किराए से हॉस्पिटल का आधा खर्चा निकल सकता है परंतु ऐसी सोच रखे कौन और ऐसा सोचे कौन पता नहीं हमारे प्रशासनिक अधिकारियों की सोच व्यापारिक क्यों नहीं होती क्यों वह सरकार का खर्चा करवाने की सोचते हैं क्यों वह सरकार का खर्चा बढ़ाने की नहीं सोचते पालमपुर में एक नहीं बीसियों ऐसे भवन है जिन्हें प्राइम लोकेशन या बिजनेस वाले लोकेशन पर बनाया गया है और अगर उन्हें पीओपी या bot के तहत किसी प्राइवेट कंपनी को दे दिया जाए तो लाखों की नहीं करोड़ों की इनकम हर महीने हो सकती है।
वेटरनरी हॉस्पिटल के बारे में भी मैंने यह सुझाव दिया था कि अगर सरकार के पास पैसा नहीं है तो इसे भी BOT और PPP मोड पर बनाया जाए , क्योंकि मेरे सुझाव को शाशन द्वारा जब प्रशासनिक अधिकारियों तक पहुंचाया गया तो उन्होंने कहा था सर हमारे पास फंडस नहीं है।
इसी तरह से पिछले कई वर्षों से टीपॉट के पास एक सरकारी आवास जो सुपरिंटेंडेंट इंजीनियर का है खाली पड़ा हुआ है उसमें कोई नहीं रहता किसी बिजनेसमैन को वह रेजिडेंस कमर्शियल यूज़ के लिए दे दिया जाए तो कोई वहां पर कैफिटेरिया खोल कर लिया होम स्टे खोलकर लाखों की इनकम सरकार को दे सकता है परंतु बात वही है कि नक्कारखाने में कोई किसी की नहीं सुनता फायर ब्रिगेड के साथ एक पुराना रेजिडेंस है जिसके ऊपर इतने अधिक झाड़ियां हो चुकी है कि आप उसे पहचान नहीं सकते कि यहां पर कोई बिल्डिंग है और इतनी घास व काई इस पर जमी हुई है कि यह गिरने की कगार पर है इस पर भी दो-तीन बार खबरें लगा चुका हूं परंतु सुनता कौन है ।मैं तो हमेशा जनहित के सुझाव ,सरकार के हित के सुझाव देता रहता हूं परंतु सुनता कोई भी नहीं। हां अगर इन मुद्दों कोई बड़ा अखबार उठाता तो शायद कुछ असर हो जाता।
सिविल हॉस्पिटल पालमपुर का पुराना दंत चिकित्सा भवन जर्जर हालत में पहुंच गया है तथा वेटरनरी हॉस्पिटल जब यह नया भवन यहां नहीं बना था तब भी मैंने बहुत बड़ी-बड़ी न्यूज़ लिखी थी कि इस वेटरनरी हॉस्पिटल भवन के यहां पर कोई आवश्यकता नहीं है। लेकिन बात वही होती है कि नक्कारखाने में तूती की कौन सुनता है?
मैंने स्वयं वेटरनरी हॉस्पिटल में जाकर पता किया था कि वहां पर कितनी ओपीडी होती है वहां पर 10 से 20 ओपीडी होती थी और वह भी कुत्तों की, पेट्स की, अब आप बताइए इस भरे बाजार में कौन अपने गाय बैल भैंस लेकर आएगा ।इस विषय पर मैंने उस वक्त के स्थानीय विधायक से भी बात की थी कि सर यहां पर बेसमेंट में और ग्राउंड फ्लोर पर पार्किंग बना दी जाए ऊपर दुकानें निकाल दी जाए तो नगर परिषद को लाखों की हर महीने इनकम हो सकती है जिससे हमारे सिविल हॉस्पिटल की बिजली पानी सफाई का खर्चा बहुत आराम से निकल सकता है यहां तक की कुछ स्टाफ का खर्च भी निकल सकता है नए equipment आ सकते हैं। और हॉस्पिटल की बहुत अच्छी तरह से देखभाल हो सकती है। परंतु ना जाने कौनसी प्रशासनिक मजबूरियां थी कि फिर भी यहां पर पुराना भवन को गिराकर नया भवन बना दिया गया ।आप आज भी जा कर देखिए यहां पर कोई ज्यादा ओपीडी नहीं होती है। उस समय के एक डॉक्टर मुझसे उलझ पड़े थे कि बड़े पत्रकार बनते हो हम लोग बेवकूफ नहीं है जो यहां बैठे हैं। जिसका सीधा सा मतलब है कि वह लोग नहीं चाहते थे कि यहां से हॉस्पिटल शिफ्ट हो ,जबकि वेटरनरी कॉलेज में कागड़ा का सबसे बड़ा हॉस्पिटल है।
इसी तरह से दो-तीन बार मेरे द्वारा यह आर्टिकल भी लिखा है कि civil होोस्पिटल के फ्रंट साइड में एक बहुत बड़ी खाली स्पेस छोड़ा गया है जिसमें कम से कम 20 दुकानें निकल सकती हैं और उन 20 दुकानों के किराए से हॉस्पिटल का आधा खर्चा निकल सकता है परंतु ऐसी सोच रखे कौन? और ऐसा सोचे कौन?
पता नहीं हमारे प्रशासनिक अधिकारियों की सोच व्यापारिक या व्यावसायिक क्यों नहीं होती ?क्यों वह सरकार का खर्चा करवाने की सोचते हैं? क्यों वह सरकार का खर्चा बढ़ाने की नहीं सोचते ?
पालमपुर में एक नहीं बीसियों ऐसे भवन है जिन्हें प्राइम लोकेशन या बिजनेस वाले लोकेशन पर बनाया गया है और अगर उन्हें PPP या BOT के तहत किसी प्राइवेट कंपनी को दे दिया जाए तो लाखों की नहीं करोड़ों की इनकम हर महीने हो सकती है।
वेटरनरी हॉस्पिटल के बारे में भी मैंने यह सुझाव दिया था कि अगर सरकार के पास पैसा नहीं है तो इसे भी BOT और PPP मोड पर बनाया जाए , क्योंकि मेरे सुझाव को शासन द्वारा जब प्रशासनिक अधिकारियों तक पहुंचाया गया तो उन्होंने कहा था सर हमारे पास फंडस नहीं है।
इसी तरह से पिछले कई वर्षों से टी बड होटल के पास एक सरकारी आवास जो सुपरिंटेंडेंट इंजीनियर का है खाली पड़ा हुआ है उसमें कोई नहीं रहता किसी बिजनेसमैन को वह रेजिडेंस कमर्शियल यूज़ के लिए दे दिया जाए तो कोई वहां पर कैफिटेरिया खोल कर या होम स्टे खोलकर लाखों की इनकम सरकार को दे सकता है ।परंतु बात वही है कि नक्कारखाने में कोई किसी की नहीं सुनता ।
फायर ब्रिगेड के साथ एक पुराना रेजिडेंस है जिसके ऊपर इतने अधिक झाड़ियां उग चुकी है कि आप उसे पहचान नहीं सकते कि यहां पर कोई बिल्डिंग भी है । इस भवन इतनी घास व काई जमी हुई है कि यह गिरने की कगार पर है ।इस पर भी दो-तीन बार खबरें लगा चुका हूं परंतु सुनता कौन है?
मैं तो हमेशा जनहित के सुझाव ,सरकार के हित के सुझाव देता रहता हूं परंतु सुनता कोई भी नहीं। हां अगर इन मुद्दों कोई बड़ा अखबार उठाता तो शायद कुछ असर हो जाता। इसी तरह से अभी हाल ही में पटवार खाने बनाया गया क्या यह पटवारखाना शहर के किसी अन्य स्थान पर जहां पर बनाया जा सकता था,? और यह 34 भवन ऐसे स्थान पर हैं जहां पर पार्किंग की बहुत बढ़िया सुविधा या कमर्शियल कंपलेक्स बहुत बढ़िया ढंग से बनाया जा सकता है और उसके लिए आपको कहीं भटकने की जरूरत भी नहीं है हमारे पालमपुर में ही इतने बड़े बड़े बिल्डर तैयार हो चुके हैं कि वह ही इसे पीपीपी या बी ओ टी स्कीम के तहत बनाकर लोगों को सुविधाएं प्रदान कर सकते हैं बहुत बड़ा कमर्शियल कंपलेक्स बन सकता था। रानी की बात तो यह है कि सिविल हॉस्पिटल में बहुत बड़ा भवन तो बना दिया गया परंतु एंबुलेंस या अन्य लोगों के लिए पार्किंग के कोई ध्यान नहीं दिया गया है इतने बड़े हॉस्पिटल में पार्किंग ना हो यह समझ से परे है कई बार एंबुलेंस पार्किंग में फंस जाती हैं और मरीज परेशान हो जाते हैं।
होटल टी बड के पास कई वर्षों से बिजली बोर्ड के सुपरिंटेंडेंट इंजीनियर का खाली पड़ा रेजिडेंस
आप इन झाड़ियों और बेलों के नीचे अगर कोई भवन ढूंढ पाओ तो आपकी नजर को दाद देनी पड़ेगी