Editorial

*Editorial :गले साड़ी पेड़ों की कीमत ज्यादा या इंसानी जीवन की?*

कल पालमपुर में तूफान ने बरपाया कहर सड़क किनारे खड़े पेड़ों के कारण हुई भारी तबाही.

Tct chief editor

#bksood कहते हैं ना कि नक्कारखाने में तूती की कोई नहीं सुनता !!
इसी तरह के हालात खोखले जर्जर गले हुए सड़े हुए सूखे पेड़ों के बारे में है जो कि सड़क के किनारे कभी भी हादसे का कारण बन सकते हैं ।
इसके बारे में मैं पिछले कई वर्षों से लिख रहा हूं परंतु किसी के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती ।अभी हाल ही में यूनिवर्सिटी के पास एक इंसान की जीवन लीला खत्म हो गई जब वह स्कूटर पर सवार हो कर अपने ऑफिस से घर की ओर जा रहा था कि उसके स्कूटर पर पेड़ गिर पड़ा और उस इंसान का जीवन उस गले सड़े पेड़ के कारण चला गया ।
कल ही तूफान ने पालमपुर में तबाही मचाई और इतने अधिक वृक्ष गिरे कि गिनने मुश्किल हो गए ।इसी क्रम में बिन्दराबन में एक 26 वर्षीय महिला जिसके पेट में अभी 2 माह का गर्भ था तथा अभी कुछ महीने पहले ही उसकी शादी हुई थी उस की जीवन लीला खत्म हो गई ,लेकिन किसी को क्या फर्क पड़ता है? कोई जवान चला जाए बुजुर्गों चला जाए एक इंसान मर जाएं या 20 इंसान मर जाएं, लेकिन पेड़ों को काटने की परमिशन देने के लिए हमारे कागजों के फॉर्मेलिटी पूरी होनी चाहिए इसमें चाहे एक महीना लगेगा 1 साल लगे 1 लोग मरे या 20 लोग मरे परंतु फ़ाइल एक टेबल से दूसरे टेबल तक पहुंचने में चींटी की चाल से ही चलनी चाहिए ।
वृक्षों को काटने की परमिशन की फाइल को कई बार महीने नहीं सालों लग जाते हैं और तब तक हादसा हो चुका होता है। यूनिवर्सिटी के आसपास इतनी सूखे और जमीन छोड़ चुके पेड़ हैं जिनकी वजह से कभी ना कभी अवश्य ही 10-20 लोगों की जान जाएंगी यह बात आप मुझसे लिखवा कर ले लीजिए । हमारे कानून इतने सख्त हैं पेड़ों के बारे में कि आप इंसान का कत्ल तो कर सकते हो परंतु पेड़ नहीं काट सकते उस आवारा जानवर के कारण आपके बच्चे यह आपके परिवार के किसी सदस्य की जान जा सकती है लेकिन आप उस आवारा जानवर को भगा नहीं सकते । एक पेड़ की टहनी कट गई तो एनजीटी वाले आ जाएंगे पर्यावरण वाले आ जाएंगे कि यह क्यों काटा? किसने काटा ? एक पेड़ ना कटने के कारण कई बार कई परियोजनाएं सालों साल लंबित पड़ी रहती है ।सड़के नहीं निकल पाती डैम नहीं बन पाते स्कूल हॉस्पिटल की बिल्डिंग नहीं बन पाती हैं क्योंकि डर है तो एनजीटी का या पर्यावरण वालों का।
अरे भाई अगर आप किसी प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए पांच पेड़ काटते हो तो उस प्रोजेक्ट को बनाने वाले से 50 पेड़ लगवा लें ना? लेकिन पांच पेड़ कटवा कर उस प्रोजेक्ट को पूरा होने दीजिए उस हॉस्पिटल को बन जाने दीजिए उस स्कूल कॉलेज की बिल्डिंग को बन जाने दीजिए जिसमें बच्चे पढ़ेंगे या जहां पर मरीजों का इलाज होगा या जहां पर लोगों को रोजगार मिलेगा ।
जितना ख़ौफ़ हमारे सरकारी विभागों में एनजीटी और पर्यावरण वालों का है इतना ही ख़ौफ़ अगर पुलिस और प्रशासन का होता तो शायद देश में अपराध आधे से भी कम हो जाते। किसी पेड़ के कारण किसी का जीवन चला जाए किसी का परिवार बेसहारा हो जाए किसी के सिर से माया बाप का साया चला जाए या किसी की बहन किसी का ,भाई का कोई भी सगा संबंधी चला जाए लेकिन पेड़ नहीं कटना चाहिए।
हमारी कुछ निजी संपत्तियों तथा सरकारी संपत्तियों के ऊपर पेड़ इतनी बुरी तरह से झुके होते हैं कि वह उस परिवार की जान के लिए खतरा बने हुए होते हैं लेकिन प्रशासन के हाथ इतने बंधे हुए होते हैं कि वह चाह कर भी कुछ नहीं कर पाता बस डर है तो एनजीटी और पर्यावरणविदों का। ऐसे गले सड़े कानून का क्या फायदा आप उन पेड़ों को नहीं काट सकते जो 100 साल पुराने हैं जो गल चुके हैं सड़ चुके हैं और इतने बेशकीमती भी नहीं है केवल मात्र जलाने के काम आ सकते हैं ,परंतु किसी भी सरकारी अधिकारी की या हिम्मत नहीं होती कि वह उन पेड़ों को सरकारी जमीन से कटवा लें या जहां पर जान माल के लिए निजी संपत्तियों में भी खतरा बने हुए हैं वहां से उन्हें कटवा कर लोगों की जान की रक्षा करवा सकें। इस तरह के लंबे-लंबे लेख लिखने का शायद कोई फायदा नहीं होगा जब तक शासन प्रशासन और हमारी कानून व्यवस्था संवेदनशीलता से इस विषय पर नहीं सोचेगी कि उन पेड़ों को उन जानवरों को जो मानव जीवन के लिए खतरा बने हुए हैं उन्हें हटाने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए। सरकार को ऐसा कानून बनाना चाहिए कि किसी भी आवारा पशु के कारण सड़क पर कोई हादसा ना हो किसी भी पेड़ के कारण किसी की जान ना जाए सोचिए कल यूनिवर्सिटी के आसपास जो पेड़ गिरे हैं अगर किसी बस पर गिरते तो शायद 10 या 20 लोगों की जाने जा सकती थी परंतु क्या करें हाथ बंधे हुए हैं और साथ में मैं अधिकारी हूं तो मैं जिम्मेवारी क्यों लूं?

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