*एक सुंदर रचना -:लेखिका तृप्ता भाटिया*



समझदारी की तरफ बढ़ती हुई उम्र भी ना बड़ी अजीब चीज़ है..साला हर मिनट में अलग रंग ले लेती है । ये ऐसा वक़्त है जब जिम्मेदारियां , शौक और अस्तित्व में से किसी एक को चुनना पड़ता है और हम मिडल क्लास लोग आदर्श बनना ही चुन पाते हैं या हमें चुनना ही पड़ता है हमारे लिए बाकी ऑप्शन जैसे एक शो पीस की तरह रखे होते हैं । जब पहली दफा परिपक्वता की सीढ़ी पार करके 21 की उम्र पर पहला कदम रखते हैं तो चहक रहे होंते हैं ..हमारे पास इतने रिश्ते होते हैं कि अंजुलि में नहीं समा पाते , आँचल छोटा पड़ता है …लोग जुड़ते हैं और जुड़ते जाते हैं …हम ये तय नहीं करते कि हमें जरूरत है या नहीं हमें हर कोई अपना लगता है । लगता है दुनिया कितनी खूबसूरत है , बेवजह ही लोग डिप्रेसेड रहते हैं ..और उस वक़्त लगता भी यही है कि ये रिश्ते हमारी उम्र से ज्यादा चलेंगे ।पर फिर ना कमबख्त एक मोड़ आता है जैसे किसी लंबी सड़क को तय करते वक़्त ब्रेकर ….ये ब्रेकर सिर्फ ब्रेकर नहीं ब्रोकर भी होता है ….बहुत कुछ तोड़ देता है यार ….तब हमें महसूस होता है कि हर चीज़ वैसी थी ही नहीं जो हम देखते आए थे ..पीठ पीछे ख़ंजर घोपने वाली कहावतें पुरानी हो चुकी अब लोग ना सिर्फ सीने पर वार करते हैं बल्कि मुकर भी जाते हैं … मुझे लगता है मुकरना सबसे बड़ी त्राषदी है …ये वो समझ सकता है जिसने झेला है …खैर अब भी मुट्ठीभर रिश्ते बचे होते हैं ….आखिर में छूट जाने के लिए ….वो लोग जो जान बन जानते हैं जिनके बगैर लगता है हमें लगता है हम जी ही नहीं सकते वो सबसे पहली सफ़ में खड़े होते हैं दूर जाने वालो में ….ज़िन्दगी की एक अच्छी और बुरी बात ये है कि ये आपके हर डर को खत्म कर देती है …और हर हाल में…. आप जिस बात से जितना डरते हैं वो उतनी करीब आ खड़ी होती है …..मैं मानती हूँ ज़िंदगी के मुश्किल वक़्त ज़िन्दगी के अपने तरीक़े होते हैं शायद कांट छांट करने के जैसे पौधों से छाँटकर जर्जर , ज़र्द पत्तियां हटा दी जाती हैं ताकि वो समूचे पेड़ को ना सड़ा दें वैसा ही कुछ …..प्रकृति ने अपने फिल्टर अलग बनाएं है मनुष्य से भी बेहतर ….। आप जब 25 का पड़ाव पार करते हैं तो उन बाकी बचे मुट्ठीभर रिश्तो में से उंगली पर गिनाने भर के नाम ही रह जाते हैं ….आप यकीन मानिए आप बेहद खुशनसीब है यदि 25 का पड़ाव पर करने के बाद भी आपके सबसे करीबी रिश्ते आपकी दोनों हाथ की उंगलियों पर गिने जा सकते हैं अमूमन तो हाथ खाली ही मिलते हैं । 25 का पड़ाव अहम पड़ाव है जहां आप शिथिल हो जाते हैं भावनाओं में या ये कहें स्थिर हो जाते हैं …आपको यकीनन बेहद फर्क पड़ता है हर किसी के जाने का आप चाहे इसे कितना भी झुठलाएँ पर फर्क बस इतना आता है कि अब आप और गिड़गिड़ाना नहीं चाहते …किसीको चीखकर नहीं बताना चाहते कि आपको जरूरत है उनकी ….आप टूट रहें हैं ढह रहे हैं पर दूसरी ओर आप खुद को बचा रहे होते हैं ….इन झूठे रिश्तो से …फरेब से या झूठी तसल्लियों से …आप पूरी तरह खाली हो चुके होते हैं …….एक दरगाह जितने शांत …जहां आने जाने वालों का कितना भी तांता हो …आप स्वयं में लीन मुस्कुराकर देखते हैं हर बिलखते ,मुस्कुराते चेहरे को ….एक अन्तरिम मुस्कुराहट लपेट …30 के पार और 40 के बीच जवां और सम्पूर्ण समझदारी की अनुभूति हर पग सोच कर उठाने की सोच मन मे पनपी रहती है पर होता वही है जी विधान ने लिखा हो क्योंकि….. अब उम्र में भी वो उम्र नहीं रही है असल में उम्र ने विश्वासघात करते हुए ह्रदियघात करना शुरू जर दिया है किस के सीने में कब दर्द उठे और कौन खामोशी से चलता बने कोई पता नहीं है।
अब जब भी मेरे सीने में दर्द उठता है तो कौन सा दर्द है मुझे खुद ही पता नहीं चलता।
