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पूर्व_आई_जी_जहूर_हैदर_जैदी_सहित_8_पुलिसकर्मी_हत्या_के_दोषी_करार

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21 जनवरी 2025–(#पूर्व_आई_जी_जहूर_हैदर_जैदी_सहित_8_पुलिसकर्मी_हत्या_के_दोषी_करार)–

शिमला के कोटखाई के चर्चित गुड़िया प्रकरण का सूरज लॉकअप हत्याकांड के मामले मे पूर्व आई.जी. सहित 8 पुलिस अधिकारियों व कर्मचारियों को गत शनिवार दोषी करार दिया गया है। स्मरण रहे शिमला के तत्कालीन एस.पी, डी.डब्लू नेगी को निर्दोष मानते हुए अदालत ने बरी कर दिया है। इन दोषी पाए गए दोषियों को 27 जनवरी को सजा सुनाई जाएगी। खैर इन पुलिस विभाग के अफसरो और कर्मियों को दोषी करार देने के समाचार ने एक बार फिर आठ वर्ष बाद एक मासूम लड़की के साथ हुए बलात्कार और हत्या के जघन्य अपराध की याद ताजा करवा दी है। यह बात दर्ज करने काबिल है कि गुडिया की हत्या करने वाले अपराधी को अदालत सजा सुना चुकी है। यह मामला जिसमे पुलिसकर्मी दोषी करार दिए गए है पुलिस जांच और तफ्तीश से जुड़ा है। पुलिसकर्मियों की दोषसिद्वी पुलिस की वर्किंग की पोल खोलती है। हालांकि यह सच है कि पुलिसकर्मियों ने निर्दोष सूरज की हत्या सोच-समझ कर नही की होगी, लेकिन वह सोच-विचार कर एक निर्दोष को गुड़िया की जघन्य हत्या का आरोपी बना रहे थे।

मेरी समझ मे इस जघन्य अपराध के चलते उस समय उपजे जनाक्रोश के कारण पुलिस जबरदस्त दबाव मे काम कर रही थी और वह शीघ्र अति शीघ्र किसी को भी हत्याकांड का दोषी करार कर और गिरफ्तार कर जनाक्रोश को शांत करना चाहती थी। सूरज क्योंकि नेपाली मूल का था इसलिए पुलिस के लिए वह सोफ्ट टार्गेट था, इसलिए पुलिस उस पर वह जुर्म कबूल करने का दबाव बना रही थी जो उसने कभी किया ही नहीं था। इस मामले की जांच करने वाली सीबीआई ने पुलिस टॉर्चर के सभी सबूत अदालत के समक्ष प्रस्तुत किए है। टॉर्चर के चलते सूरज की मौत हो जाती है और पुलिस उसकी हत्या का आरोप अन्य संदिग्ध के ऊपर लगाने का प्रयास करती है। मामले के तथ्य समाज की इस धारणा को मजबूत करेगें कि हमारी पुलिस की जांच प्रक्रिया के चलते बहुत से निर्दोष लोगो को दोषी मान कर सजा दे दी जाती है, जबकि विकसित देशों मे वैज्ञानिक साक्ष्यो को अधिक अहमियत दी जाती है। इस सन्दर्भ मे यह कहना भी जरूरी है हमारी पुलिस तरह-तरह के काम करती है और उसे अपराध तफ्तीश मे महारत हासिल नही होती है।

जघन्य अपराध की तफ्तीश के लिए अलग से ऐसी विशेषज्ञ पुलिस होनी चाहिए जो वैज्ञानिक साक्ष्य जुटा सकती हो। सूरज लॉकअप हत्याकांड यह सिद्ध करता है कि आज भी पुलिस पत्थर युग की तर्ज पर आरोपियों से मारपीट करती है, थर्ड डिग्री का इस्तेमाल कर टॉर्चर करती है। मेरे विचार मे एक सभ्य समाज मे किसी आरोपी के साथ मारपीट और टॉर्चर करना स्वीकार्य नही है। सूरज की हत्या ने पुलिस की कार्यपद्वती को बेनकाब कर दिया है और हिमाचल पुलिस की छवि को तार-तार कर दिया है। इससे यह सिद्ध होता है कि हिमाचल पुलिस भी शिकायत और फाइल के निपटान मे दिलचस्पी रखती है न की सबको न्याय प्रदान करने मे। पुलिस को इस सिध्दांत को याद रखना चाहिए कि हमारे कानून का आधार है कि भले सौ गुनाहगार छूट जाए लेकिन किसी भी निर्दोष को सजा नही मिलनी चाहिए।

#आज_इतना_ही।

आज हमारे बहुत ही प्रबुद्ध आशीर्वाद करता महेंद्र नाथ सोफत जी का जन्म दिन है हम सभी की ओर से उन्हें जन्मदिन की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं tct

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