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Editorial:-विवेकानंद मेडिकल रिसर्च ट्रस्ट हॉस्पिटल: सपनों और हकीकत के बीच की खाई*

 

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*विवेकानंद मेडिकल रिसर्च ट्रस्ट हॉस्पिटल: सपनों और हकीकत के बीच की खाई*

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पालमपुर का विवेकानंद मेडिकल रिसर्च ट्रस्ट हॉस्पिटल एक ऐसा प्रोजेक्ट था, जिसने क्षेत्र की जनता और माननीय शांता कुमार जी के सपनों को पंख दिए। शांता कुमार जी ने इस अस्पताल के निर्माण के लिए दिन-रात एक कर दिया। उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों के साथ मिलकर घर-घर जाकर चंदा इकट्ठा किया, सरकार से लंबा संघर्ष किया, और अंततः इस अस्पताल का निर्माण शुरू करवाया। उच्च स्तर के निर्माण कार्य के बाद यह अस्पताल बाहर से देखने में एक आदर्श मेडिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट जैसा लगता है। लेकिन अंदर से यह खोखला है, जैसे किसी बीमार व्यक्ति को सूट-टाई पहनाकर जेंटलमैन बना दिया जाए, लेकिन उसका शरीर अंदर से बीमारी से ग्रसित हो।
जनता की उम्मीदें और हकीकत
जनता ने इस अस्पताल के लिए अपने गहने तक बेचकर चंदा दिया था। उन्हें उम्मीद थी कि पालमपुर और आसपास के क्षेत्र को बेहतरीन चिकित्सीय सुविधाएं मिलेंगी। लेकिन आज यह अस्पताल न तो शांता कुमार जी के सपनों को पूरा कर पाया है और न ही जनता की उम्मीदों पर खरा उतर सका है। लोगों का कहना है कि अगर यह अस्पताल किसी प्राइवेट संस्था को सौंप दिया जाता, तो कम से कम वे लोग जो प्राइवेट इलाज का खर्च उठा सकते हैं, इसका लाभ उठा पाते। लेकिन आज की स्थिति यह है कि यहां न तो पैसे वाले आना चाहते हैं और न ही गरीबों का इलाज सस्ते में हो पाता है।

मैनेजमेंट और जनता की उम्मीदों के बीच का अंतर क्यों?
इस अस्पताल का मैनेजमेंट और ट्रस्ट पूरी कोशिश करने के बावजूद वह परिणाम नहीं दे पाया, जिसकी उम्मीद की गई थी। जनता की अपेक्षाएं हमेशा ऊंची होती हैं। वे चाहते हैं कि उन्हें मुफ्त या कम खर्च में बेहतर इलाज मिले, ताकि उन्हें चंडीगढ़, लुधियाना या जालंधर जैसे बड़े शहरों की ओर न भागना पड़े। लेकिन जब किसी मरीज को इन शहरों में रेफर किया जाता है, तो उसके परिवार वालों के मन में यह डर सताता है कि न जाने कितना खर्च होगा और इलाज सही भी होगा या नहीं।

आजकल मेडिकल प्रोफेशन में लोगों का विश्वास कम होता जा रहा है। पहले डॉक्टरों को भगवान का दर्जा दिया जाता था, लेकिन आज यह प्रोफेशन लूट का साधन बन गया है। मरीजों को लगता है कि उनकी बीमारी को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है और फिर उनसे मोटी रकम वसूली जाती है।

इंफ्रास्ट्रक्चर बहूत अच्छा पर सुविधाओं की कमी
विवेकानंद मेडिकल रिसर्च ट्रस्ट हॉस्पिटल का इंफ्रास्ट्रक्चर तो बेहतरीन है, लेकिन यहां डॉक्टरों की कमी हमेशा खलती है। कोई भी हाईली क्वालिफाइड डॉक्टर यहां आकर रुकना नहीं चाहता, चाहे उसे कितना भी बड़ा पैकेज क्यों न दिया जाए। इसके पीछे क्या कारण है, यह तो मैनेजमेंट ही बता सकता है। लेकिन जनता की अपेक्षा यह है कि यहां हर तरह का इलाज उपलब्ध हो, चाहे वह पैसे देकर ही क्यों न मिले।

सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों की दुविधा यह है कि
आज सरकारी अस्पतालों में मुफ्त इलाज की सुविधा है, लेकिन वहां भी डॉक्टरों की कमी और लंबी लाइनें लोगों को परेशान करती हैं। वहीं, प्राइवेट अस्पतालों में लोगों का विश्वास कम हो गया है, क्योंकि वहां इलाज का खर्च आसमान छूता है। ऐसे में, गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों के पास कोई विकल्प नहीं बचता।

राजनीति और स्वास्थ्य सेवाओं की उपेक्षा
आजकल चुनाव जीतने के लिए फ्रीबी की राजनीति हो रही है। सभी पार्टियां इस जाल में फंसी हुई हैं, जिससे सरकार का राजस्व इन्हीं मदों में खर्च हो रहा है। शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाओं पर सरकार का ध्यान कम होता जा रहा है। सत्ता में बने रहने के लिए किए जाने वाले वादे अंततः जनता को ही भुगतने पड़ते हैं।

विवेकानंद मेडिकल रिसर्च ट्रस्ट हॉस्पिटल एक ऐसा प्रोजेक्ट है, जो बाहर से तो आकर्षक लगता है, लेकिन यह अस्पताल जनता की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर सका है। इसकी सुविधाओं और प्रबंधन में सुधार की तत्काल आवश्यकता है। सरकार और इसके प्रशासन को चाहिए कि वे इस अस्पताल को एक आदर्श स्वास्थ्य केंद्र के रूप में विकसित करें, इस अस्पताल को किसी मदद की जरूरत हो तो उसे पूरा करें ताकि यह जनता के सपनों को साकार कर सके। अन्यथा, यह अस्पताल सिर्फ एक दिखावा बनकर रह जाएगा।

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