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Editorial:*मेरा देश महान यहां पर इंसान से ज्यादा प्यारी कुत्तों की जान*

सुप्रीम कोर्ट की दो-टूक: आवारा कुत्तों से मुक्त हों सड़कें, कब तक झेलेगा आम आदमी परेशानी?

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मेरा देश महान यहां पर इंसान से ज्यादा प्यारी कुत्तों की जान

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सुप्रीम कोर्ट की दो-टूक: आवारा कुत्तों से मुक्त हों सड़कें, कब तक झेलेगा आम आदमी परेशानी?

ट्राई सिटी टाइम्स एडिटोरियल बंगलुरू

। सुप्रीम कोर्ट ने लावारिस कुत्तों और पशुओं की समस्या पर साफ लफ्जों में कहा कि सड़कें इनसे मुक्त होनी चाहिए। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एभयी अंजारिया की पीठ ने जोर देकर कहा कि ये कुत्ते न सिर्फ लोगों को काटते हैं, बल्कि दोपहिया वाहन चालकों और साइकिल सवारों का पीछा कर उन्हें गिरा देते हैं। गंभीर हादसे हो रहे हैं—काटने से लेकर दुर्घटनाओं तक। कोई नहीं बता सकता कि कौन सा कुत्ता शांत है और कब हमला कर देगा। लोगों की सुरक्षा सर्वोपरि है।

आखिर कब तक आम आदमी इनके चलते परेशानी झेलेगा?कोर्ट ने सवाल उठाया कि स्कूलों, अस्पतालों, कोर्ट परिसरों, बस स्टैंड या रेलवे स्टेशनों में आवारा कुत्तों की क्या जरूरत? इन्हें हटाने पर किसी को आपत्ति क्यों हो?

7 नवंबर 2025 के आदेश में सुधार की मांग करने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान पीठ ने नगर निगमों को कड़े निर्देश दिए। सभी कुत्तों को शेल्टर में रखना व्यावहारिक नहीं, लेकिन वैज्ञानिक और मानवीय तरीके से समस्या हल करनी होगी। निकायों को नियमों का सख्ती से पालन करना होगा, वरना जिम्मेदारी तय होगी।।

हालिया उदाहरण चिंताजनक हैं। राजस्थान हाईकोर्ट के दो जजों को लावारिस पशुओं से दुर्घटना हुई—एक अभी भी रीढ़ की चोट से जूझ रहे हैं। बाघ-बकरी चाय के प्रमोटर की सड़क पर कुत्तों के झगड़े से मौत हो गई।

नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी, बेंगलुरु ने भी हमलों की रिपोर्ट दी। वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कुत्तों का पक्ष लेते हुए कहा कि ये आमतौर पर नुकसान नहीं पहुंचाते, लेकिन कोर्ट ने पुरानी जानकारी बताते हुए खारिज कर दिया।सुप्रीम कोर्ट जैसी व्यस्त अदालत ने पिछले छह महीनों में इस मुद्दे पर तीन बार सुनवाई की—दो सुधारात्मक फैसले दिए। इतने प्रयास इंसानी मामलों में कम ही दिखते हैं। यह सरकारों की असफलता का आईना है।

डॉग लवर्स का वोट बैंक बचाने के चक्कर में सड़कें खतरनाक बनी हुई हैं। कोर्ट के आदेश अभिनंदनीय हैं, लेकिन जिम्मेदारी सरकारों की। बजट आवंटन, अफसरों की जवाबदेही और कड़ाई से अमल जरूरी। रोकथाम इलाज से बेहतर—नागरिक सुरक्षा पहले!

ट्राई सिटी टाइम्स की अपील: सरकारें जागें, सड़कें व अन्य सभी सार्वजनिक स्थलों को सुरक्षित बनाएं।

09.01.2026

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