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Editorial:*चमियाणा अस्पताल: सरकारी स्वप्न या मरीजों का कष्ट? पर्दे के पीछे कहीं कोई और खेल तो नहीं हो गया* ?

 

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चमियाणा अस्पताल: सरकारी स्वप्न या मरीजों का कष्ट? पर्दे के पीछे कहीं कोई और खेल तो नहीं हो गया ?

Bksood chief editor TCT

शिमला से महज 20 किमी दूर चंबागनी घाटी में बसा अटल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल सुपर स्पेशलिटीज (AIMSS), चमियाणा, हिमाचल प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं की चमकदार महत्वाकांक्षा का प्रतीक है। 2022 में उद्घाटित यह 400 बेड्स वाला 1,200 करोड़ का मेगा प्रोजेक्ट कैंसर, कार्डियोलॉजी और अन्य सुपर स्पेशियलिटी सेवाएं देने का वादा करता है, जो सतत चिकित्सा पहुंच बढ़ाने की दिशा में एक कदम माना जाता था।
मगर इसकी सुनसान, जंगल जैसी लोकेशन—न दुकानें, न ढाबे, न होटल—मरीजों और तीमारदारों को रोजमर्रा की मजबूरियों से जूझने पर मजबूर कर देती है, जहां भूखे पेट इलाज कराना आम बात हो गई है। पहले IGMC शिमला और कमला नेहरू अस्पताल में भी ऐसी ही समस्याओं का सामना कर चुके मरीज अब यहां दोहरी कठिनाइयों से रू-ब-रू हैं।
एनएच-5 पर स्थित होने के बावजूद भटाकुफर से 3 किमी का टेढ़ा-मेढ़ा कच्चा रास्ता बिना स्ट्रीट लाइट्स के रातों को खतरे से खाली नहीं रखता, और पार्किंग महज 60 वाहनों की होने से 300-400 दैनिक मरीजों का जत्था सड़क किनारे जाम पैदा कर दुर्घटनाओं को न्योता देता है। आसपास न केमिस्ट शॉप, न कैंटीन, न सराय—, जिससे बारिश-बर्फ में पहुंच लगभग नामुमकिन हो जाती है।
हाईकोर्ट ने 2025 में इन खामियों पर गहरी नाराजगी जताते हुए OPD सेवाएं सड़क सुधार तक रोक दीं, और जनवरी 2026 तक हिमकेयर इंप्लांट सप्लाई बाधित बनी रही, जिससे तीमारदार खुले आसमान तले भूखे रुकने को विवश हैं।
जयराम ठाकुर सरकार ने 100 एकड़ सस्ती जमीन और आसान पर्यावरण मंजूरी के बहाने यह रिमोट एरिया चुना था, ग्रामीण स्वास्थ्य को मजबूत करने का दावा किया, लेकिन शिमला शहर, मंडी या धर्मशाला जैसे घनी आबादी वाले केंद्र क्यों नजरअंदाज रह गए?
2018 में शुरू होकर 2023 में उद्घाटित यह प्रोजेक्ट निर्माण देरी और कॉस्ट ओवररन से जूझा, जिसकी पुष्टि RTI डेटा करती है। विपक्ष इसे ‘व्हाइट एलिफेंट’ करार देता है—क्या पीछे ठेकेदारों या भूमि डीलरों का लाभ छिपा है? लोकल मीडिया की रिपोर्ट्स बताती हैं कि मरीज रास्ते में ही थककर लौट जाते हैं या बदतर, दम तोड़ देते हैं, जबकि राज्य की 80% आबादी पहाड़ी शहरों के आसपास बसी है।

पहले IGMC और कमला नेहरू में सुविधाओं की कमी को सरबजीत सिंह बॉबी जैसे सेवकों ने लंगर से भरा था, जहां वीरभद्र सिंह तक ने भोजन बांटा, लेकिन चमियाणा शिफ्ट के बाद वही कष्ट दोहराए—कोरोना, बाढ़-आपदा में भूखे मरीज। 2024-25 में HC के सवालों और OPD बंदी ने स्थिति उजागर की, 2026 तक पार्किंग विवाद वन भूमि क्लियरेंस पर अटका। यह प्रोजेक्ट ग्रामीणों के वरदान कम, अभिशाप ज्यादा सिद्ध हो रहा, जहां तत्काल शटल बसें-एम्बुलेंस, 1,000 वाहनों की पार्किंग, कैंटीन-गेस्ट हाउस (PM-Ayushman फंड से), स्ट्रीट लाइट्स-साइनेज जरूरी हैं। दीर्घकालिक रूप से सैटेलाइट यूनिट शहर केंद्र शिफ्ट कर आबादी-केंद्रित निवेश सुनिश्चित करें, पारदर्शी ऑडिट से फिजूलखर्ची रोके।

ऐसे संकट में चमकते हैं ‘बेल्हा सरदार’ सरबजीत सिंह बॉबी—IGMC-कमला नेहरू में 15 वर्षों से लंगर चलाने वाले, जिन्होंने सरकारी मना करने पर चमियाणा के जंगल में ही 24×7 भोजन सेवा शुरू की। ठंड-बारिश में गर्म रोटियां बांटते, कोरोना-कैंसर मरीजों का सहारा बनते, देवभूमि का यह गौरव ईश्वर सदा सलामत रखे।

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