इंजीनियर विजय प्रेमी: जहाँ जन्म लिया, वहीं निभाया फर्ज
माटी की पुकार और मौन सेवा का अद्भुत उदाहरण


माटी की पुकार और मौन सेवा का अद्भुत उदाहरण:
इंजीनियर विजय प्रेमी: जहाँ जन्म लिया, वहीं निभाया फर्ज

कहते हैं—
इंसान जीवन में चाहे जितनी ऊँचाइयाँ छू ले, बड़े पद, प्रतिष्ठा, मान-सम्मान और संपन्नता अर्जित कर ले, पर जिस धरती पर उसका जन्म हुआ हो, जहाँ बचपन की स्मृतियाँ बसी हों—
उस मिट्टी का ऋण कभी समाप्त नहीं होता।
शहरों की चकाचौंध और आधुनिक सुविधाएँ भी उस आत्मिक सुकून की बराबरी नहीं कर सकतीं जो अपने गाँव, अपने लोगों और अपनी माटी में मिलता है। इसी भाव को अपने जीवन में सहज रूप से जीते हैं इंजीनियर विजय प्रेमी (पूर्व संपदा अधिकारी, कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर)।
उन्होंने सेवा काल का अधिकांश समय पालमपुर में बिताया और उच्च पद पर रहते हुए ईमानदारी व निष्ठा से कार्य करते हुए सम्मानपूर्वक सेवानिवृत्त हुए।
आपको बता दें कि विजय प्रेमी एक ऐसी शख्सियत है जो जमीन से जुड़े हुए अधिकारी के रूप में जाने जाते हैं तथा उच्च पद पर रहते हुए भी वह गरीबों की जरूरतमंदों की तथा समाज के प्रति सेवा और संवेदना को नहीं भूल पाए जहां कहीं भी ,कभी भी किसी को जरूरत होती है वह हमेशा आगे बढ़कर मदद करने को तैयार रहते हैं।
उनका पैतृक गाँव चौन्त्रा, जिला हमीरपुर में है, जहाँ आज भी उनकी माता जी और भाई-बंधु निवास करते हैं। उनके पिता जी 2013 मेंं इस संसार से बिदा हो गए थे। गाँव से उनका रिश्ता केवल औपचारिक नहीं, बल्कि आत्मिक रहा है।
चौन्त्रा के श्मशान घाट में तीन गाँवों के लोगों का अंतिम संस्कार किया जाता है। वहाँ बैठने के लिए जो शेड वर्षों पहले बनाया गया था, वह लगभग दो वर्ष पूर्व जंगल की आग में जलकर नष्ट हो गया था। इसके बाद हर अंतिम संस्कार के अवसर पर लोग एकत्र होते, बैठने की असुविधा झेलते और हर बार यही चर्चा होती—
“शेड बनना चाहिए”,
“चंदा इकट्ठा करना पड़ेगा”,
“किसी को जिम्मेदारी लेनी होगी।”
चर्चाएँ होती रहीं, पर समाधान आगे नहीं बढ़ा।
गाँव के एक व्यक्ति ने एक दो बार इंजीनियर विजय प्रेमी के गाँव आने पर उनसे शेड के लिए चंदा इकट्ठा करने की बात कही। इस लोहड़ी पर जब वे अपने पैतृक घर आए, तब भी वही बात दोहराई गई। उस दिन उन्होंने बहुत ध्यान से यह बात सुनी
और उसी क्षण भीतर एक स्पष्ट निर्णय जन्म ले गया। उन्होंने महसूस किया कि हर बार चंदे की बात तो होती है, लेकिन शेड आज तक नहीं बन पाया।
बस, यहीं से मौन सेवा का आरंभ हुआ।
लोहड़ी के बाद—
बिना किसी को बताए,
बिना किसी से चंदे की अपील किए,
उन्होंने स्वयं मिस्त्रियों को बुलाया।
पुराने जले हुए ढांचे को हटवाकर
वहीं खड़े रहकर एक मजबूत, सुरक्षित और स्थायी नया शेड बनवाया। इसमें सबसे बड़ी समस्या वेल्डिंग सेट के लिए विद्युत कनेक्शन की थी जो जंगल में कहीं भी नजदीक नहीं था। इसके लिए जनरेटर की किराए पर व्यवस्था की गई जो बहुत मुश्किल से हो पाई।
करीब एक लाख रुपये की लागत से बना यह शेड
न किसी दान-सूची का परिणाम था,
न किसी ग्रामीण से एक रुपया लिया गया,
न किसी रिश्तेदार से सहयोग माँगा गया।
सबसे महत्वपूर्ण बात—
न कोई प्रचार,
न फोटो,
न शिलापट्ट,
न कोई श्रेय लेने की इच्छा।
यह कोई दिखावटी सेवा नहीं थी—
यह जन्मभूमि के प्रति निभाया गया कर्तव्य था।
जब इस विषय में उनसे पूछा गया, तो उनका उत्तर अत्यंत सरल था—
“ईश्वर ने मुझे दिया है,
तो मेरा भी फर्ज बनता है
कि मैं अपने गाँव के काम आ सकूँ।”
शायद यही सच्ची सेवा है—
जो बिना शोर के,
बिना अपेक्षा के,
और बिना नाम के
बहुत कुछ कह जाती है।
इंजीनियर विजय प्रेमी द्वारा बनवाया गया यह शेड
केवल एक संरचना नहीं,
बल्कि उस संस्कार का प्रतीक है
जो अपनी मिट्टी से जुड़े रहने की सीख देता है।
सच्चा इंसान वही है
जो अपनी जड़ों को नहीं भूलता—
और जब समय आता है,
तो बिना कहे, आगे बढ़कर अपना फर्ज निभा जाता है।

नया बनाया गया शेड

पुराना जर्जर शेड



