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पालमपुर शहर के बीचों-बीच स्तिथ सार्वजनिक शौचालय बना सिरदर्द, दुकानदार परेशान—पालमपुर नगर निगम बेपरवाह :- संजीव सोनी अध्यक्ष संयुक्त व्यापार मंडल पालमपुर.

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पालमपुर शहर के बीचों-बीच बना सार्वजनिक शौचालय बना सिरदर्द, दुकानदार परेशान—पालमपुर नगर निगम बेपरवाह :संजीव सोनी अध्यक्ष संयुक्त व्यापार मंडल पालमपुर.

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पालमपुर:शहर के बीचों-बीच, एंबेसी स्वीट्स के सामने मस्जिद गली के मुहाने पर बना सार्वजनिक शौचालय आज स्थानीय दुकानदारों और राहगीरों के लिए गंभीर समस्या बन चुका है। हालात यह हैं कि इस शौचालय को लेकर एक-दो बार नहीं बल्कि बीसियों बार खबरें प्रकाशित हो चुकी हैं, बावजूद इसके नगर निगम पालमपुर की नींद अब तक नहीं खुली है।
जब-जब खबर लगती है, तब-तब महज एक सप्ताह के लिए सफाई और मरम्मत का दिखावटी अभियान चलाया जाता है। उसके बाद हालात फिर जस के तस—या यूं कहें उससे भी बदतर हो जाते हैं। सवाल यह है कि क्या नगर निगम के फील्ड स्टाफ की जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह सप्ताह में एक-दो बार शहर के सार्वजनिक शौचालयों का निरीक्षण करे, सफाई और रखरखाव सुनिश्चित करे?
हैरानी की बात यह है कि शहर के बिल्कुल केंद्र में स्थित होने और बार-बार शिकायतें व खबरें आने के बावजूद इस शौचालय की दुर्दशा बनी हुई है। संयुक्त व्यापार मंडल के अध्यक्ष संजीव सोनी ने बताया कि अस्पताल से लेकर सुभाष चौक तक के पूरे बाजार क्षेत्र में यही एकमात्र सार्वजनिक शौचालय है। इसके बावजूद इसकी बदहाल स्थिति के कारण आसपास के दुकानदारों और ग्राहकों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
उन्होंने आरोप लगाया कि नगर निगम के अधिकारियों ने अपने लिए तो आधुनिक और सुविधाजनक शौचालय बनवा लिए हैं, लेकिन जो दुकानदार नियमित रूप से टैक्स देते हैं और निगम के हर सामाजिक कार्य में सहयोग करते हैं, उनकी परेशानियों को कोई सुनने वाला नहीं है। “दुकानदारों की दिक्कतें क्यों समझी जाएं, यह सोचने की फुर्सत भी शायद किसी को नहीं,” उन्होंने कहा।
करीब दो-तीन महीने पहले भी इस मुद्दे को लेकर खबर प्रकाशित हुई थी। तब कुछ दिनों के लिए सफाई हुई, पाइपलाइन दुरुस्त की गई, पानी की टंकी भी ठीक की गई, लेकिन कुछ ही समय बाद हालात फिर पहले जैसे हो गए। मौजूदा स्थिति यह है कि इस शौचालय में जाना किसी सजा भुगतने से कम नहीं।
नगर निगम पालमपुर खुद को ‘स्वच्छ शहर’ बताने का ढिंढोरा पीटता है, लेकिन यदि कभी इस शौचालय की वास्तविक हालत देखने आ जाए, तो शायद खुद पर शर्म आ जाए। सवाल यह है कि क्या इस तरह के खोखले दावों में कहीं हम खुद भी गलती तो नहीं कर रहे? यह लापरवाही की हद है, उदासीनता की भी इंतहा।

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