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“13 साल की बेबसी, 13 दिन मौत का इंतज़ार — क्या यह सही फैसला था?”

“इच्छामृत्यु: क्या भारत में अब वक्त आ गया है कानून बदलने का?” “जब जीना बन जाए सज़ा: क्या मौत चुनने का हक होना चाहिए?”

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13 साल की बेबसी, 13 दिन मौत का इंतज़ार — क्या यह सही फैसला था?”

Tct ,bksood, chief editor

ट्राई सिटी टाइम्स | संपादकीय bksood
इच्छामृत्यु: दर्द, इंतज़ार और एक जरूरी बहस
गाजियाबाद के 31 वर्षीय हरीश राणा का निधन एक ऐसी घटना है, जिसने एक बार फिर देश को सोचने पर मजबूर कर दिया है। करीब 13 साल तक कोमा में रहने के बाद जब उन्हें सुप्रीम कोर्ट से पैसिव इच्छामृत्यु की अनुमति मिली, तो उम्मीद थी कि उनकी पीड़ा का अंत अब जल्द हो जाएगा। लेकिन इसके बाद भी 13 दिनों तक उनका परिवार उनकी मृत्यु का इंतजार करता रहा। यह इंतजार सिर्फ समय नहीं था, बल्कि एक ऐसा दर्द था जिसे शब्दों में समझाना मुश्किल है।
यहां सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि क्या यह प्रक्रिया इतनी लंबी और पीड़ादायक होनी चाहिए थी? अगर यह तय हो चुका था कि अब उनके ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं है, तो क्या उन्हें जल्दी और बिना दर्द के विदा देने का कोई तरीका नहीं हो सकता था?
भारत में अभी केवल पैसिव इच्छामृत्यु की अनुमति है, जिसमें मरीज को जिंदा रखने वाली मशीनें या फीडिंग ट्यूब हटा दी जाती हैं और फिर प्रकृति के भरोसे छोड़ दिया जाता है। लेकिन इस प्रक्रिया में समय लगता है और कई बार यह समय मरीज और उसके परिवार दोनों के लिए बहुत भारी पड़ता है।
दुनिया के कुछ देशों ने इस मामले में अलग रास्ता अपनाया है। नीदरलैंड, बेल्जियम, कनाडा, स्पेन और कोलंबिया जैसे देशों में सख्त नियमों के तहत एक्टिव इच्छामृत्यु की अनुमति है, जहां डॉक्टर एक इंजेक्शन देकर मरीज की पीड़ा को तुरंत खत्म कर देते हैं। वहां इस पूरी प्रक्रिया को बहुत सोच-समझकर और कड़े नियमों के साथ लागू किया गया है।
भारत में भी अब यह बहस तेज हो रही है कि क्या हमें भी इस दिशा में सोचना चाहिए। कई लोग मानते हैं कि अगर कोई इंसान असहनीय दर्द में है, ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं है और वह खुद जीना नहीं चाहता, तो उसे इस दर्द से मुक्ति पाने का अधिकार मिलना चाहिए। वहीं दूसरी तरफ यह डर भी है कि अगर ऐसा कानून बना, तो कहीं इसका गलत इस्तेमाल न होने लगे।
असल में बात सिर्फ कानून की नहीं है, बल्कि इंसानियत की भी है। हरीश राणा का मामला यह बताता है कि सिर्फ अनुमति देना ही काफी नहीं है, बल्कि प्रक्रिया भी ऐसी होनी चाहिए जो मरीज और उसके परिवार के लिए कम से कम तकलीफदेह हो।
इच्छामृत्यु को मौलिक अधिकार बनाने की मांग भावनात्मक रूप से सही लग सकती है, लेकिन इसके लिए बहुत मजबूत व्यवस्था की जरूरत होगी, ताकि कोई भी फैसला दबाव या मजबूरी में न लिया जाए।
आखिर में सवाल यही है कि क्या सिर्फ सांस लेते रहना ही जीवन है, या फिर गरिमा के साथ जीना और गरिमा के साथ विदा लेना भी उतना ही जरूरी है। हरीश राणा की कहानी हमें यही सोचने पर मजबूर करती है कि अब इस मुद्दे पर साफ, संवेदनशील और संतुलित फैसला लेने का समय आ गया है।

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