*सूखे पेड़ों से खतरा: गले-सड़े कानूनों के कारण क्यों नहीं काटे जा सकते ये पेड़?*
कानून की जकड़ में बंधे अधिकारी: चाहकर भी नहीं काट सकते सूखे पेड़


पालमपुर में सूखे पेड़ों का खतरा, गले-सड़े कानूनों से बंधे अधिकारी

पालमपुर: टी बड के पास कई वर्षों से सूखे हुए पेड़ खड़े हैं, जो किसी भी समय बड़ा हादसा कर सकते हैं। तेज हवाओं में ये पेड़ गिरकर न केवल जानमाल को नुकसान पहुंचा सकते हैं, बल्कि आसपास की इमारतों और वाहनों को भी भारी क्षति हो सकती है।
हालांकि, इन पेड़ों को हटाने की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही है, लेकिन पुराने और जटिल कानूनों के कारण अधिकारी इन्हें काटने में असमर्थ हैं। पर्यावरण संरक्षण के तहत बनाए गए नियमों के चलते सूखे और खतरनाक पेड़ों को भी हटाने पर पाबंदियां हैं।
यह स्थिति केवल सुरक्षा के लिए ही नहीं, बल्कि विकास कार्यों के लिए भी बाधा बन रही है। कई बार निर्माण परियोजनाएं ऐसे पेड़ों की वजह से अटक जाती हैं, जिससे आर्थिक नुकसान के साथ-साथ बेरोजगारी भी बढ़ती है।
समाधान के रूप में, सूखे पेड़ों को हटाकर उनकी जगह नए पेड़ लगाने की आवश्यकता है। इससे पर्यावरण संरक्षण और मानव सुरक्षा के बीच संतुलन बनाया जा सकता है।
सरकार और संबंधित विभागों से अपेक्षा है कि वे इन कानूनों में संशोधन करें, ताकि खतरनाक पेड़ों को हटाकर संभावित हादसों को रोका जा सके और विकास कार्यों में रुकावटें दूर की जा सकें।
यह हालत केवल पालमपुर के नहीं है हिमाचल के किसी भी कस्बे शहर या जगह पर आप चले जाइए जंगलों में लाखों में नही करोड़ों में नहीं शायद अरबों की देवदार वह अन्य बहुमूल्य इमारती लकड़ी और फ्यूल वुड या अन्य व्यावसायिक पेड़ की बेशकीमती लकड़ी ऐसे ही गिरी पड़ी मिलेगी जो सड़ जाएगी लेकिन सरकारी विभागों के अधिकारियों के हाथ और दिमाग दोनों ही इतने बंधे पडे हैं कि उन गले सड़े कानून के कारण वह उनको वहां से उठाकर बेचने की हिम्मत नहीं कर सकते ,क्योंकि अगर उन्होंने कुछ ऐसा कदम उठाया तो बिना मतलब के उन्हें विवादों में घसीट लिया जाएगा या फिर कोर्ट के कचहरी के चक्कर लगाने पड़ेंगे।
क्या सरकार को ऐसा नहीं करना चाहिए कि ऐसे पेड़ों को जो इंसानी जीवन के लिए खतरा हो या फिर जिनके काटने से पर्यावरण को कम नुकसान हो और इंसानी जीवन को बचाया जा सके ऐसा निर्णय नहीं लिया जा सकता लेकिन सरकार ना तो रेवेन्यू चाहती होगी और ना ही इंसानों का जीवन।
