जनमंच:*गिग कामगारों के लिए नया श्रम संहिता: एक सुरक्षा कवच या अपर्याप्त पट्टी?*
इन वर्कर्स की मांग उठाने में मीडिया का अहम रोल रहा जिस पर सरकार ने एक्शन भी लिया मीडिया को चाहिए कि वह इसी तरह की जनहित के मामले में उठाएं ताकि व्यवस्था में सुधार हो


गिग कामगारों के लिए नया श्रम संहिता: एक सुरक्षा कवच या अपर्याप्त पट्टी?

भारत के शहरी परिदृश्य में दोपहिया वाहनों पर सवार, हमेशा जल्दी में दिखने वाले युवा आज डिजिटल भारत की असली रीढ़ हैं। ये गिग वर्कर हमारे भोजन, सामान और यहां तक कि आवागमन की जरूरतों को पूरा करते हैं। लेकिन पिछले 31 दिसंबर को इन लाखों कामगारों ने राष्ट्रव्यापी हड़ताल करके एक स्पष्ट संदेश दिया कि यह रीढ़ टूटने के कगार पर है। उनके इस आंदोलन के दबाव में केंद्र सरकार ने महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किया और ब्लिंकिट, ज़ोमैटो जैसे प्लेटफॉर्म्स को अपने ’10-मिनट डिलीवरी’ जैसे खतरनाक वादे वापस लेने को मजबूर किया। इसके साथ ही, श्रम मंत्रालय ने गिग और प्लेटफॉर्म कामगारों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने वाले चार नए श्रम संहिता के मसौदे भी जारी किए, जिन्हें अप्रैल 2026 से लागू करने का प्रस्ताव है। सतह पर यह एक बड़ी जीत और प्रगतिशील कदम लगता है, लेकिन गहराई से देखें तो यह मूल समस्याओं का समाधान करने में नाकाफी प्रतीत होता है।
सरकार का प्रस्ताव है कि एक प्लेटफॉर्म पर 90 दिन या अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर कुल 120 दिन काम करने वाला श्रमिक सामाजिक सुरक्षा के दायरे में आएगा। इसमें दुर्घटना बीमा, स्वास्थ्य लाभ और भविष्य में पेंशन जैसे लाभ शामिल होंगे। साथ ही, भौगोलिक क्षेत्र और कौशल के आधार पर न्यूनतम मजदूरी तय करने और एक डिजिटल पहचान पत्र देने की बात कही गई है। ये सभी प्रावधान एक ऐसे वर्ग के लिए पहली आधिकारिक मान्यता हैं, जिसे अब तक ‘स्व-नियोजित’ या ‘पार्टनर’ का ठप्पा लगाकर सभी कानूनी सुरक्षाओं से वंचित रखा गया था। इस नजरिए से यह कदम निस्संदेह सराहनीय है और एक सकारात्मक शुरुआत का संकेत देता है।
हालांकि, जमीनी हकीकत यह है कि गिग कामगारों का संघर्ष सिर्फ दुर्घटना बीमा या भविष्य की पेंशन तक सीमित नहीं है। उनकी हड़ताल की मुख्य मांगें कहीं अधिक मूलभूत और तत्काल हैं। पहली बड़ी मांग है एक गारंटीशुदा न्यूनतम आय की। डिलीवरी पार्टनर्स के लिए कम से कम 24,000 रुपये मासिक आय और राइड-हेलिंग ड्राइवरों के लिए 20 रुपये प्रति किलोमीटर के मानक की मांग इस बात का प्रमाण है कि वर्तमान में उनकी कमाई बेहद अनिश्चित और अक्सर जीवन-यापन के स्तर से भी नीचे है। काम के लंबे घंटों और ईंधन, रखरखाव जैसे खर्चों के बाद उनके हाथ में जो बचता है, वह शायद ही किसी न्यूनतम मजदूरी के बराबर पहुंच पाता हो। नए मसौदे न्यूनतम मजदूरी के सिद्धांत को तो स्वीकार करते हैं, लेकिन इस गारंटी को गिग इकोनॉमी की अनियमित प्रकृति में व्यावहारिक रूप से कैसे लागू किया जाएगा, यह अभी एक बड़ा सवाल बना हुआ है।
दूसरी और सबसे गंभीर चुनौती है प्लेटफॉर्म्स के एल्गोरिदम की निरंकुशता और अपारदर्शिता का मुद्दा, जिस पर नए नियम लगभग खामोश हैं। एक डिलीवरी क्यों रद्द हुई, एक विशेष यात्रा का किराया कैसे तय हुआ, या थोड़ी सी शिकायत पर एक कामगार का खाता बिना किसी स्पष्टीकरण के क्यों अवरुद्ध हो गया, इन सवालों का कोई जवाब नहीं है। कामगार एक अदृश्य, मनमाने और अमानवीय एल्गोरिदमिक प्रबंधन के शिकार हैं। ’10-मिनट डिलीवरी’ जैसे दबाव उन्हें सड़क सुरक्षा नियम तोड़ने और अपनी जान जोखिम में डालने के लिए मजबूर करते हैं। सरकार ने इस दबाव को कम करने का कदम उठाया है, लेकिन एल्गोरिदमिक पारदर्शिता, निष्पक्ष काम आवंटन और एक मानवीय शिकायत निवारण तंत्र स्थापित करने की मांग अभी भी अनसुनी है। बिना इसके, सामाजिक सुरक्षा के लाभ महज कागजी हौदे बनकर रह जाएंगे।
इसके अलावा, गिग कामगारों की ‘श्रमिक’ के रूप में कानूनी मान्यता की मूल मांग भी पूरी तरह से अनदेखी की गई लगती है। नए नियम उन्हें एक अलग श्रेणी में रखकर, पारंपरिक श्रम कानूनों के पूरे दायरे से बाहर कर देते हैं। इसका मतलब है कि न्यूनतम मजदूरी, काम के घंटे, छुट्टियों, ग्रेच्युटी या समूह बीमा जैसे अधिकांश श्रम अधिकारों से वे वंचित रह जाएंगे। उन्हें सिर्फ कुछ चुनिंदा सुरक्षा कवच दिए जा रहे हैं, जबकि उनकी मांग पूर्ण और सम्मानजनक श्रमिक का दर्जा पाने की है।
निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि केंद्र सरकार का यह फैसला एक द्वंद्व को दर्शाता है। एक तरफ, वह इस तेजी से बढ़ते और अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र को नजरअंदाज नहीं कर सकती। दूसरी तरफ, वह प्लेटफॉर्म कंपनियों के व्यवसाय मॉडल में बहुत अधिक हस्तक्षेप करने से भी हिचकिचाती है। नतीजा यह हुआ है कि जो नियम बनाए गए हैं, वे एक ऐसे विशाल भवन की नींव के समान हैं, जिसकी दीवारें और छत अधूरी हैं। गिग कामगारों को जो चाहिए, वह है एल्गोरिदम के शिकंजे से मुक्ति, उनकी मेहनत के अनुरूप एक सम्मानजनक और स्थिर आय की गारंटी, और कानून की नजर में पूर्ण श्रमिक का दर्जा। सरकार के वर्तमान प्रस्ताव इनमें से किसी भी मुद्दे का संपूर्ण समाधान नहीं करते। यह केवल एक शुरुआत है, और अगर सरकार वाकई इस डिजिटल रीढ़ को मजबूत बनाना चाहती है, तो उसे कामगारों की आवाज सुननी होगी और इन कानूनों को और मजबूत, स्पष्ट तथा न्यायसंगत बनाना होगा। नहीं तो, दिसंबर 2025 की हड़ताल सिर्फ एक शुरुआत भर साबित होगी और आने वाले समय में और बड़े आंदोलन देखने को मिल सकते हैं।



