Editorial::*सुप्रीम कोर्ट की सख्ती ने तय की जिम्मेदारी, मानव सुरक्षा को सर्वोपरि रखने की चेतावनी*


Editorial::*सुप्रीम कोर्ट की सख्ती ने तय की जिम्मेदारी, मानव सुरक्षा को सर्वोपरि रखने की चेतावनी*

ट्राई सिटी टाइम्स संपादकीय
आवारा कुत्तों का संकट अब किसी एक शहर, एक राज्य या किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरे देश के लिए एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य और सुरक्षा चुनौती बन चुका है। सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी और रुख ने इस लंबे समय से उपेक्षित समस्या को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है। अदालत का यह सवाल कि यदि किसी 9 वर्षीय बच्चे की आवारा कुत्तों के हमले में मौत हो जाती है तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी, केवल भावनात्मक नहीं बल्कि व्यवस्था की असफलता पर सीधा प्रहार है। यह पहली बार है जब न्यायपालिका ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि आवारा कुत्तों से होने वाली मौतों और गंभीर चोटों पर मुआवजा अनिवार्य किया जाना चाहिए और इस जिम्मेदारी से न तो राज्य बच सकता है, न ही वे लोग जो सार्वजनिक स्थानों पर खुलेआम कुत्तों को भोजन देकर स्थिति को और जटिल बना रहे हैं।
देश के आंकड़े स्वयं इस संकट की भयावहता बयान करते हैं। हर वर्ष लाखों लोग कुत्तों के काटने का शिकार होते हैं, जिनमें बड़ी संख्या बच्चों और बुजुर्गों की है। भारत में दुनिया की सबसे अधिक रेबीज से होने वाली मौतें दर्ज होती हैं और इसका मुख्य कारण कुत्तों का काटना है। शहरी इलाकों में यह समस्या बाजारों, कॉलोनियों, पार्कों और स्कूलों के आसपास अधिक दिखाई देती है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह धीरे-धीरे महामारी का रूप ले रही है। स्वास्थ्य व्यवस्था पर इसका सीधा दबाव पड़ता है—एंटी-रेबीज इंजेक्शन, इलाज का खर्च, कामकाजी दिनों की हानि और मानसिक आघात, जिनका कोई समुचित आकलन तक नहीं किया जाता।
पशु प्रेम और मानवीय संवेदना भारतीय समाज की पहचान रही है, लेकिन जब यह संवेदना अनुशासन और जिम्मेदारी से मुक्त हो जाती है, तब वह स्वयं संकट का कारण बन जाती है। खुले में कुत्तों को भोजन देना पहली नजर में दयालुता लग सकता है, पर यही अनियंत्रित फीडिंग आवारा कुत्तों की संख्या, उनका क्षेत्रीय आक्रामक व्यवहार और मानव-संघर्ष को बढ़ाती है। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी कि “अगर इतना ही प्रेम है तो उन्हें अपने घर ले जाएं” एक कठोर लेकिन यथार्थपरक संदेश है। यह स्पष्ट करता है कि सार्वजनिक स्थान किसी की निजी भावनाओं के प्रयोगशाला नहीं हो सकते, जहां मानव जीवन जोखिम में डाल दिया जाए।
इस पूरे संकट में नगर निगमों और स्थानीय प्रशासन की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। एनिमल बर्थ कंट्रोल और टीकाकरण योजनाएं वर्षों से कागजों तक सीमित हैं। नसबंदी और टीकाकरण की गति इतनी धीमी है कि बढ़ती आवारा कुत्तों की आबादी के सामने वे निरर्थक प्रतीत होती हैं। परिणामस्वरूप, अदालत को यह चेतावनी देनी पड़ी कि यदि राज्य समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाते तो उन्हें भारी मुआवजा देना पड़ेगा। यह मुआवजा केवल आर्थिक दंड नहीं, बल्कि प्रशासनिक विफलता का सार्वजनिक स्वीकार भी होगा।
यह मुद्दा केवल कुत्तों तक सीमित नहीं है। सीनियर एडवोकेट विकास सिंह की यह टिप्पणी कि यह कुत्ता-मनुष्य विवाद नहीं बल्कि समस्त जीव-मनुष्य संघर्ष है, हमें व्यापक दृष्टि अपनाने की याद दिलाती है। सांपों के काटने से हर साल हजारों मौतें, बंदरों के बढ़ते हमले और अब आवारा कुत्तों का आतंक—ये सभी संकेत हैं कि मानव और वन्य या अर्ध-वन्य जीवों के बीच संतुलन बिगड़ चुका है। इस संतुलन को बहाल करना केवल भावनाओं से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक, कानूनी और प्रशासनिक उपायों से ही संभव है।
समाधान स्पष्ट हैं, बशर्ते इच्छाशक्ति हो। राष्ट्रव्यापी और अनिवार्य टीकाकरण व नसबंदी अभियान, स्कूलों, अस्पतालों और बाजारों को नो-फीड जोन घोषित करना, डॉग फीडर्स के लिए स्पष्ट नियम और दायित्व तय करना, तथा नागरिक समाज, व्यापारिक संगठनों और एनजीओ की भागीदारी से स्थायी शेल्टर और निगरानी तंत्र विकसित करना—ये सभी कदम अब टाले नहीं जा सकते। सबसे महत्वपूर्ण यह कि नीति-निर्माण में मानव सुरक्षा को केंद्र में रखा जाए।
पशु प्रेम मानवता का गुण है, लेकिन मानव जीवन की सुरक्षा उससे भी बड़ा नैतिक दायित्व है। यदि समय रहते संतुलित और कठोर निर्णय नहीं लिए गए, तो यह संकट और भयावह रूप धारण करेगा। सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी नहीं, दिशा दिखाई है। अब यह सरकारों, संस्थाओं और नागरिकों पर निर्भर है कि वे इस दिशा में चलें। भारत को सबसे पहले मानव-केंद्रित, सुरक्षित और जिम्मेदार समाज बनना होगा—यही सच्ची करुणा का मार्ग है।



