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*पत्रकारिता के डॉक्टर, डॉ. संजीव शर्मा का आत्ममंथन:एक सफर, कई माध्यम*

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पत्रकारिता के डॉक्टर, डॉ. संजीव शर्मा का आत्ममंथन: एक सफर, कई माध्यम

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डॉ. संजीव शर्मा ने हाल ही में अपने फेसबुक ब्लॉग में अपने ही जीवन और पत्रकारिता के सफर को लेकर जो आत्ममंथन किया है, वह उनके व्यक्तित्व और जीवन की सच्चाई का साफ़ आईना है। अपने बारे में खुलकर, बिना लाग-लपेट और बिना आत्मप्रचार के लिख पाना आसान नहीं होता। ऐसी ईमानदार सच्चाई को सार्वजनिक मंच पर रखना वही कर सकता है, जिसमें आत्मविश्वास के साथ-साथ साहस भी हो। डॉ. संजीव शर्मा का यह लेख इसी हिम्मत का प्रमाण है।
यह आत्ममंथन किसी साधारण पत्रकार का नहीं, बल्कि पत्रकारिता के डॉक्टर कहे जाने योग्य व्यक्ति का है। पीएचडी जैसी उच्च शैक्षणिक उपलब्धि के बावजूद उनकी भाषा में कहीं भी बोझिलपन नहीं है। डॉ. संजीव शर्मा जिस सहजता से अपने संघर्ष, अनुभव और असमंजस को सामने रखते हैं, वह बताता है कि असली विद्वता दिखावे में नहीं, सादगी में होती है।
डॉ. संजीव शर्मा लिखते हैं कि पत्रकारिता की शुरुआत करते समय उनके मन में कोई बड़ा खाका या महत्वाकांक्षा नहीं थी। बस यह संकल्प था कि काम हिमाचल में और हिमाचल के लिए करना है। रेडियो के उस दौर से जुड़ी पीढ़ी से आने के कारण, जब आवाज़ के सहारे पूरी दुनिया दिखाई देती थी, शब्दों और ध्वनि से उनका लगाव स्वाभाविक था। हालांकि पेशेवर यात्रा अखबार से शुरू हुई, लेकिन मन हमेशा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और रेडियो की ओर खिंचता रहा।
दिल्ली जाकर राष्ट्रीय मीडिया में काम करना उनके सफर का अहम अध्याय रहा। वहां उन्होंने एंकरिंग, संपादन और समाचार निर्माण की बारीकियां सीखीं। इसके बावजूद, डॉ. संजीव शर्मा का मन पहाड़ों से दूर नहीं टिक पाया। अनुभव के साथ वे हिमाचल लौटे और टेलीविजन पत्रकारिता में पूरी निष्ठा से जुट गए। ज़ी न्यूज़ में लंबी पारी और ऑल इंडिया रेडियो शिमला में सैकड़ों बुलेटिन बनाना उनके बहुआयामी अनुभव का प्रमाण है। वरिष्ठ समाचार वाचकों से यह सुनना कि उनका लिखा रेडियो के लिए “नापकर लिखा हुआ” लगता है, उनके लिए किसी सम्मान से कम नहीं था।
अपने फेसबुक ब्लॉग में डॉ. संजीव शर्मा यह भी ईमानदारी से स्वीकार करते हैं कि आलोचना और अस्वीकार्यता के क्षण उनके जीवन का हिस्सा रहे हैं। यहां तक कहा गया कि उनकी आवाज़ टीवी के लिए उपयुक्त नहीं है। यह सुनना किसी भी पत्रकार को भीतर तक आहत कर सकता है, लेकिन उन्होंने इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। समय के साथ वही आवाज़ उनकी पहचान बन गई। आज जब लोग उन्हें चेहरे से नहीं, बल्कि आवाज़ से पहचानते हैं, तो यह उनकी मेहनत, धैर्य और आत्मविश्वास की जीत है।
प्रिंट मीडिया में संपादकीय जिम्मेदारियां निभाने के बाद डॉ. संजीव शर्मा ने बदलते दौर को समझते हुए डिजिटल मीडिया को अपनाया। यहां उन्हें काम करने की स्वतंत्रता मिली और दर्शकों का विश्वास भी। जिस मंच पर उन्होंने जिम्मेदारी संभाली, वहां दर्शकों की संख्या लाखों तक पहुंची। वे स्वयं मानते हैं कि इस सफलता का श्रेय किसी एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि पूरी टीम को जाता है।
अपने आत्ममंथन के अंत में डॉ. संजीव शर्मा एक बार फिर रेडियो की ओर लौटने की इच्छा व्यक्त करते हैं। यह इच्छा किसी थकान की नहीं, बल्कि अनुभव से उपजी परिपक्व सोच की देन है। रेडियो, जहां चेहरा नहीं बल्कि आवाज़ मायने रखती है, शायद आज भी उनके व्यक्तित्व का सबसे स्वाभाविक मंच है।
आज के दौर में, जब पत्रकारिता का एक बड़ा हिस्सा केवल प्रसिद्धि, लाइक्स और वायरल होने की दौड़ में उलझा हुआ दिखाई देता है, डॉ. संजीव शर्मा का यह आत्ममंथन एक आईना भी है और एक सीख भी। जो पत्रकार जनहित से दूर हो चुके हैं, जिन्हें सत्ता से सवाल पूछने का साहस नहीं रहा, उन्हें डॉ. संजीव शर्मा के जीवन और लेखन से बहुत कुछ सीखना चाहिए। उनकी पत्रकारिता बताती है कि सच्ची पहचान शोर से नहीं, बल्कि ईमानदारी, सवाल पूछने की हिम्मत और जनता से जुड़े रहने से बनती है।

 

डॉ संजीव कुमार शर्मा द्वारा लिखा गया फेसबुक ब्लॉग जो उनकी आत्म मंथन आत्मकथा को दर्शाता है जस का तस👇👇👇

 

पत्रकारिता जब शुरू की थी तो मन में ऐसा कुछ नहीं था के किस तरह की करनी है। बस इतना जरूर था के हिमाचल में और हिमाचल के लिए करनी है। हम लोग उस दौर के थे जहाँ रेडियो सुनकर देश दुनिया और सुशील दोषी को सुनकर क्रिकेट मैच को मन की आँखों से देखा जाता था। इसलिए झुकाव रेडियो की तरफ था लेकिन शुरआत अखबार से हुई। अजीत समाचार में बतौर उप संपादक। हमारे पूर्व और बाद के पत्रकारिता के बैच पढ़ा चुके वेपा राव जी कहते थे के पत्रकार के लिए दिल्ली में काम करना जरुरी है। .. वो पंजाबी की कहवत है न..जिने लाहौर नि वेख्या…ओह जम्मया ही नहीं। इसलिए दिल्ली का रुख किया। शुरू में ndtv में हिंदी एंकरिंग का मौका मिला , फिर पांचजन्य में उप-सम्पादकी की ,लेकिन मन तो हिमाचल में था..इसलिए दिल्ली में थोड़ा बहुत अनुभव हासिल करने के दो साल बाद मन के साथ साथ तन भी हिमाचल ले आये। उस समय के प्रसिद्ध न्यूज़ शो –आँखों देखि –के साथ शुरुआत की। नलिनी सिंह एंकर थीं और अशोक श्रीवास्तव एडिटोरियल प्रमुख. खूब काम की और खूब पैसा भी मिला । एक खबर का 2500 रुपया मिलता था। बाद में ज़ी न्यूज़ ज्वाइन किया और यहाँ लम्बी पारी खेली। साथ साथरडीओ में काम करने का शौक पूरा होता रहा और आल इंडिया रेडियो शिमला के सैकड़ों बुलेटिन बनाने का अवसर मिला। अच्छा तब लगा जब जवाहर कौल और दीपक शर्मा सरीखे वरिष्ठतम समाचार वाचकों से यह सुने को मिला के तुम्हारा बनाया बुलेटिन पढ़कर मजा आता है। लगता है के किसी ने नापकर रेडियो के लिए लिखा है। खैर करीब 16 साल बाद ज़ी न्यूज़ का साथ छोड़ा तो फिर प्रिंट का रुख किया यह सोचकर के अब बुढ़िया रहे हैं तो अख़बार में जम जाते हैं। DNS में एडिटर पंजाब , हिमाचल और हरियाणा के तौर पर साल भर काम किया और हिमाचल दस्तक चले गए. वहां स्थानीय सम्पादक रहते दो साल खूब काम किया। लेकिन जब भी शाम को थका मांदा बिस्तर पर लेटता तो अंदर से आवाज़ आती — तुम प्रिंट नही इलेक्ट्रॉनिक के लिए बने हो। … लेकिन टीवी में दुबारा जाने का मन नहीं था इसलिए 2018 में टीवी के नए रूप डिजिटल मीडिया का रुख किया और पंजाब केसरी में आ गया। यहाँ आठ साल होने को हैं. प्रबंधन ने पूरी स्वतंत्रता दी , सहयोग दिया और उसी अनुपात में दर्शकों का प्यार मिल रहा है। दिलचस्प ढंग से जब मैंने यहाँ ज्वाइन किया था तो बार बार इंटरव्यू हुए । यह मेरे लिए अलग अनुभव था क्योंकि इससे पहले ऐसी स्थितियों से नहीं गुज़रा था —पुराना सीवी देखकर ही काम मिल जाता था। सलेक्शन तो हुआ या लेकिन एक साक्षात्कार करने वाले सज्जन ने कहा के आपकी आवाज़ टीवी के लिहाज़ से अच्छी नहीं है— टीवी वाली बात नहीं है —- अब 20 साल की टीवी की नौकरी के बाद जब ऐसा सुनने को मिले तो बुरा तो लगता है — ख़ास बात यह है के पहले दिन वही सज्जन यह कहकर पीछे हट गए थे के बंदा बहुत सीनियर है मैं इसका क्या इंटरव्यू लूँगा । लेकिन चयन के बाद हमने तय किया के क्यों न दर्शकों को इस खड़ूस आवाज़ के साथ ही जोड़ा जाए क्योंकि यह टीवी तो है नहीं डिजिटल है। ..इसमें सूचना ही सबकुछ है। खैर शुरुआत में नेशनल सेक्शन के लिए कार्यक्रम बनाये, साक्षात्कार किये फिर हरियाणा चुनाव में विशेष शो किये। बाद में हिमाचल का प्रभार मिला तो पेज के उस समय तीन लाख follower थे और हम 18 माइल्स से बहुत पीछे थे. धीरे धीरे पहले हम उनके करीब आये और फिर कोविड आया तो आपदा को दर्शकों के प्यार ने उपलब्धि में बदल दिया। हम न सिर्फ 18 माइल्स से आगे निकल गए बल्कि follower आज 34 लाख हैं। डेस्क और फील्ड के साथियों की मेहनती टीम दर्शकों के इस प्यार की असली हक़दार है। लेकिन मुझे कोविड के बाद एक बड़ा सुखद अनुभव हुआ। अटल टनल का उद्द्घाटन था। ..कुछ लोग आकर मिले। .. उन्होंने बताया के हमने सरसरी निगाह डाली थी लेकिन पहचाना नहीं। ..पर जैसे ही आपने बोलना शुरू किया तो हमने आवाज़ से पहचान लिया। फिर यह अनुभव बड़ी जगह हुआ और अभी भी अक्सर हो जाता है जब कोई कहता है के शक्ल से नहीं आवाज़ से पहचाना के आप हैं— अब इससे सुखद और क्या हो सकता है के ईश्वर की कृपा और दर्शकों के प्यार से आवाज़ पहचान बन गयी जिसे साक्षात्कार के समय अनफिट फॉर टीवी कहा गया था। खैर इतने बोरिंग कहानी आपको सुनाने का मन यह था के उम्र हो चली है तो रेडियो में काम करने की इच्छा एकबार फिर से हिलोरे ले रही है। हो सकता है सर्दी भी सिका एक कारन हो क्योंकि टीवी के लिए सर्दी में भी नहाकर शेव बनाकर दफ्तर जाना पड़ता है 🙁 .जबकि रेडियो में शक्ल से बिलकुल भी कोई लेना देना नहीं रहता 🙂 आप महीना भर बिना नहाये बिना शेव किये भी रह सकते हैं 🙂 — आपका क्या ख्याल है—– रेडियो में सफल हो सकता हूँ के नहीं

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