EditorialHimachal

*बेचारे माननीयों (MLA’s)को वेतन भतों पर फिजूल में किया जाता है बदनाम*

Tct

*बेचारे माननीयों को वेतन भतों पर फिजूल में किया जाता है बदनाम*

Tct ,bksood, chief editor

हिमाचल प्रदेश में इन दिनों एक विचित्र स्थिति बन गई है। राज्य गंभीर आर्थिक चुनौतियों से गुजर रहा है, Revenue Deficit Grant (RDG) जैसे महत्वपूर्ण वित्तीय सहारे के खत्म होने से हजारों करोड़ रुपये का संभावित घाटा सामने खड़ा है, लेकिन सार्वजनिक बहस का केंद्र बन गया है — विधायकों और मंत्रियों की सैलरी बढ़ोतरी। सवाल उठता है कि क्या वास्तव में यही हिमाचल की सबसे बड़ी समस्या है, या फिर असली मुद्दों से ध्यान भटकाने का यह सबसे आसान तरीका बन गया है।
नेताओं के पक्ष में दिया गया तर्क भावनात्मक नहीं, बल्कि सीधा गणितीय है, जिसे अक्सर जानबूझकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। हिमाचल प्रदेश में पूर्व और वर्तमान मिलाकर लगभग चार लाख सरकारी कर्मचारी हैं। अगर इन सभी कर्मचारियों की सैलरी में मात्र दस रुपये प्रति माह की बढ़ोतरी भी कर दी जाए, तो राज्य पर हर महीने करीब चालीस लाख रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ता है। यही नहीं, यदि यह बढ़ोतरी बीस रुपये भी हो जाए, तो खर्च दोगुना हो जाता है, लेकिन इस पर शायद ही कभी कोई बड़ा विरोध देखने को मिलता है।
इसके उलट, प्रदेश में कुल 68 विधायक हैं। अगर प्रत्येक विधायक की सैलरी में पचास हजार या साठ हजार रुपये प्रतिमाह की बढ़ोतरी भी कर दी जाए, तब भी कुल मासिक बोझ लगभग पैंतीस से चालीस लाख रुपये के आसपास ही बैठता है। यानी संख्यात्मक दृष्टि से देखा जाए तो चंद दर्जन जनप्रतिनिधियों की हजारों की बढ़ोतरी, लाखों कर्मचारियों की मामूली बढ़ोतरी के बराबर ही असर डालती है। इसके बावजूद, जब बात विधायकों या मंत्रियों की आती है, तो मामला अचानक आर्थिक नहीं बल्कि नैतिक बना दिया जाता है।
यही वह बिंदु है जहां नेताओं का तर्क मजबूत दिखाई देता है। सरकारी कर्मचारियों के वेतन में वृद्धि को आवश्यक और जायज़ मान लिया जाता है, लेकिन विधायकों के वेतन की चर्चा होते ही उसे जनता की जेब पर डाका बताकर पेश किया जाता है, जबकि वास्तविकता यह है कि कुल बजट पर इसका असर नगण्य होता है। समस्या वेतन वृद्धि नहीं, बल्कि उस चयनात्मक गुस्से की है जो केवल जनप्रतिनिधियों पर केंद्रित हो जाता है।
इस शोरगुल के बीच असली संकट धीरे-धीरे हाशिये पर चला जाता है। RDG के बंद होने से हिमाचल को आने वाले वर्षों में अनुमानित चालीस से पचास हजार करोड़ रुपये तक का नुकसान हो सकता है। इसका सीधा असर विकास कार्यों, रोजगार सृजन, सामाजिक पेंशन और जनकल्याण योजनाओं पर पड़ेगा। राज्य को या तो कर्ज़ का सहारा लेना पड़ेगा या फिर नई करों और शुल्कों के जरिए राजस्व जुटाना होगा, जिसका बोझ अंततः आम जनता पर ही आएगा।
विडंबना यह है कि जिस मुद्दे पर सबसे ज्यादा शोर मचाया जा रहा है, वह बजट को डुबोने वाला नहीं है, और जो मुद्दा वास्तव में राज्य की वित्तीय रीढ़ को कमजोर कर सकता है, उस पर अपेक्षित गंभीर चर्चा नहीं हो रही। सवाल यह नहीं होना चाहिए कि विधायक की सैलरी बढ़ी या नहीं, सवाल यह होना चाहिए कि हिमाचल की स्थायी आय के स्रोत कैसे मजबूत होंगे और RDG जैसे बड़े झटके से राज्य को कैसे उबारा जाएगा।
निष्कर्ष साफ है। अगर बहस को भावनाओं से हटाकर आंकड़ों और तथ्यों के आधार पर देखा जाए, तो यह समझना मुश्किल नहीं कि विधायकों या मंत्रियों की सैलरी बढ़ोतरी राज्य के लिए निर्णायक संकट नहीं है। असली खतरा उस बड़े वित्तीय खालीपन से है, जो RDG के खत्म होने से पैदा हो रहा है। जरूरत इस बात की है कि राजनीति वेतन पर नहीं, हिमाचल की आर्थिक सुरक्षा और भविष्य की स्थिरता पर केंद्रित हो।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button