कंगना_के_विवादित_बयान_का_हो_रहा_विरोध
अनिल सूद

13 नवम्बर 2021– (#कंगना_के_विवादित_बयान_का_हो_रहा_विरोध) —
पद्मश्री से पुरस्कृत अभिनेत्री का यह कहना है कि 1947 मे मिली आजादी “भीख” थी और असली स्वतंत्रता 2014 मे मिली है। न तो उचित है और न ही तर्कसंगत। उन्हे अपने बयान के लिए कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। सोशल मीडिया पर उन्हे खूब ट्रोल किया जा रहा है। सबसे तीखी प्रतिक्रिया भाजपा सांसद वरूण गांधी की ओर से आई है। उन्होने कहा कि ऐसी सोच या तो पागलपन है या फिर देशद्रोह। कुछ लोग कंगना को पद्मश्री देने पर भी प्रश्न खड़े कर रहे है लेकिन मै उनसे सहमत नहीं हूँ, क्योंकि उनको यह पुरस्कार कला के क्षेत्र मे दिया गया है। वह एक श्रेष्ठ अदाकारा है। इस पर उनके विवादित बयान के बावजूद भी विवाद नहीं हो सकता। मणिकर्णिका फिल्म मे झांसी की रानी की भूमिका अदा कर उन्होने यह साबित किया है, लेकिन उनका अधिक बोलना और बोलने मे अहंकार का झलकना देवभूमि हिमाचल की बेटी के लिए अच्छा नहीं है। असल मे सत्ता,धन, रूप और शोहरत यह सब अहंकार पैदा करते है। संयोग से यह सारी बाते उनके पास है। माना जाता है कि वह वर्तमान सत्ता के निकट है। पैसे की जो शो बिजनस मे सफल हो जाता है तो कमी नहीं होती। उनके सौंदर्य और उनकी शोहरत सर्वविदित है। इस सबको पचा पाना यदि असंभव नहीं तो अति कठिन अवश्य है।
पिछले कुछ समय से कंगना को यह गलतफ़हमी हो गई है कि वह सबकुछ जानती है और उन्हे मीडिया मे रहने का अजीब शौक हो गया है। वह जो बोलती है वह आज के यलो मीडिया की खुराक है। यही बात है जो कंगना को समझनी होगी कि वह आपकी हर बात इसलिए नहीं छाप रहे कि वह सही है या तर्कसंगत है। वह इसलिए छाप रहे और दिखा रहे है क्योंकि उनकी अखबार वह सब छाप कर बिक रही है या उनकी टी आर पी बढ़ रही है। मेरे विचार मे बहुत अधिक बोलना हमेशा अच्छा नहीं होता। यह देश मौन व्रत की ताकत जानता है। एक व्यक्ति मौन रह कर भी दस साल तक देश के प्रधानमंत्री रह चुके है। एक दार्शनिक ने कहा था कि यदि बिना बोले काम चलता हो तो चुपी को एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करना चाहिए।

महेंद्र नाथ सोफत पूर्व मंत्री हिमाचल प्रदेश सरकार