बहुत ही सुंदर दिल की गहराइयों से तृप्ता भाटिया द्वारा लिखा गया आलेख
Tct chief editor
कितनी बेबसी से भरे होते हैं न ये खामोशी से सने एकतरफ़ा रिश्ते, जिनसे शिकायतें तो बहुत हो पर करने का न हक़ हो, न इरादा ! वो भी उस इंसान से जिसकी दोस्ती की अहमियत सांसों के बराबर हो!
हर पल नियंत्रण रखना अपने भावों पर खुद को कैद करने के बराबर ही तो है, कभी कभी तरस आने लगता है अपने आप पर ही और अपनें इन रिश्तों पर कितनी मजबूरी है न ये कि इतने पास होते हुए भी इतने दूर हो! कोई हक नहीं जाता सकते, न नाराज़गी क्योंकि सुनने को मिलेगा फिर, इतना सारा कि कानों में गुज़न सी रहेगी कई दिन । उससे भी उन्हें कोई एहसास नहीं होगा, मेरे आहत हृदय से प्रेम की रूदन की आवाज ?
क्या सच में ये आजीवन खामोश रह जायेगी?
मुझे अपना जीवन बिना रोशनी के दीप के भांति प्रतीत होता है,बिना खुशबू के फूल जैसा होता जा रहा!
इससे अच्छा तो रमता जोगी हो जाना है।