विधान परिषदों के बहाने राज्यसभा की बात

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योगी आदित्यनाथ पर डाली पोस्ट में विधान परिषद की चर्चा हुई। कुछेक कमेंटस में कहा गया कि राज्यसभा पर भी कुछ लिखो। वहां से भी प्रधानमंत्री बने हैं। मसलन डॉ. मनमोहन सिंह और श्रीमती इंदिरा गांधी। सही है कि ये दोनों प्रधानमंत्री राज्यसभा से ही बने थे। फर्क इतना है कि इंदिरा गांधी ने साल भर बाद ही लोकसभा का चुनाव लड़ लिया था लेकिन मनमोहन सिंह ने नहीं लड़ा। मनमोहन सिंह लगातार दस साल बतौर राज्यसभा सदस्य ही प्रधानमंत्री रहे। लेकिन इन दोनों के अलावा दो और प्रधानमंत्री भी राज्यसभा की ही देन रहे हैं। एचडी देवेगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल।
आज 19 जनवरी है और मौका भी है बात करने का। आज के दिन 1966 में इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री बनी थीं। उनके साथ दो रिकॉर्ड बने। एक तो वे पहली (अभी तक आखिरी भी) महिला प्रधानमंत्री थीं। दूसरा यह कि वे पहली ऐसी पीएम थीं जो राज्यसभा सदस्य थी। मतलब उस समय जनता ने नहीं चुना था। यह अलग बात है कि उन्हें प्रधानमंत्री बनने के लिए कांग्रेस संसदीय दल में चुनाव का सामना करना पड़ा था। उनके मुकाबले थे मोरारजी देसाई। इंदिरा गांधी को 355 और मोराराजी को 169 वोट। साल भर बाद वे लोकसभा के लिए चुनी गईं।
वर्ष 1996 में ऐसे दूसरे प्रधानमंत्री बने एचडी देवेगौड़ा। करीब एक साल रहे। वैसे बाद में वे लोकसभा के लिए बराबर चुने जाते रहे। उनकी कुर्सी जाते ही इंद्र कुमार गुजराल पीएम बने। वे भी राज्यसभा सदस्य ही थे। (प्रधानमंत्री पद से हटने के कुछ दिन बाद मुझे गुजराल जी का इंटरव्यू करने का मौका मिला था। इस पर फिर कभी बात करेंगे। ) डॉ. मनमोहन सिंह दोनों मर्तबा राज्यसभा सदस्य ही थे। वैसे मनमोहन सिंह ने लोकसभा चुनाव एक बार (1999 में) दिल्ली से लड़ा था लेकिन हार गए।
राज्य सभा की संरचना किए जाने का उद्देश्य सालों से चर्चा में हैं। इस उच्च सदन की स्थापना की मूल वजह थी एक बैलेंस बनाना। लोकसभा में वोटों की सियासत से चुन कर आने वालों पर चेक रखने के लिए भी। लेकिन बाद में यह स्पष्ट हो गया कि ज्यादातर सियासी दल अपने नेताओं को adjust करते हैं बस राज्यसभा में। ज्यादातर हारे-नकारे। हम सालों से देख रहे हैं कि राज्यसभा में क्या कुछ होता है। कौन-कौन जाने लगे हैं। दलगत राजनीति के चलते कई बिल अटके रहते हैं। तिस पर विशेषज्ञों को भी मनोनीत करने का प्रावधान है जिससे विभिन्न क्षेत्रों से माहिर लोग यहां पहुंच सके। लेकिन इन विशेषज्ञों का कोई लाभ देश को मिला होगा ये भी चर्चा का विषय है। मसलन अभिनेत्री रेखा ने अपने 6 साल के कार्यकाल में एक भी सवाल नहीं पूछा। कई मनोनीत विशेषज्ञ बस इतनी हाजिरी पूरी करते हैं कि उनकी सदस्यता बची रहे। राज्यसभा जैसी ही स्थिति कमोबेश विधान परिषदों की है। राज्यसभा-विधान परिषदों के मौजूदा स्वरूप को लेकर गंभीर चर्चा होनी चाहिए देश में।