पाठकों के लेख एवं विचारChandigarhHaryanaHimachalJ & KMohaliPanchkulaPunjabदेश

घातक होगा सार्वजनिक सवालों पर बहस से भागना

बी के सूद चीफ एडिटर

Bksood chief editor

घातक होगा सार्वजनिक सवालों पर बहस से भागना
वोटर आईडी को आधार कार्ड से जोड़ने का विधेयक लोकसभा में बिना बहस के पारित हो गया है। इसे चुनाव सुधारों की दिशा में एक बड़ा कदम कहा जा रहा है। इस विधेयक को लोकसभा में लाये जाने से पहले चुनाव आयोग और पीएमओ के बीच एक बैठक होने का विवाद भी उभरा था। इस विवाद के परिदृश्य में यदि इस चुनाव सुधार पर संसद में बहस हो जाती तो अच्छा होता। लेकिन ऐसा हो नही पाया। शायद इस सरकार की यह संस्कृति ही बन गयी है कि विपक्ष की कोई भी बात सुननी ही नहीं है। जिस तरह से प्रधानमंत्री भी केवल अपने मन की ही बात जनता को सुनाने के सिद्धांत पर चलते आ रहे हैं उनकी सरकार भी उन्हीं के नक्शे कदम पर चल रही है। दर्जनों उदाहरण इस चलन के नोटबंदी से लेकर कृषि कानूनों के पास होने से लेकर उनके वापिस होने तक के मौजूद हैं। इस चलन में सबसे बड़ी कमी यही होती है कि आप हर बार हर समय ठीक नहीं हो सकते। आर्थिक क्षेत्र में जितने भी फैसले लिये गये हैं उनका ठोस लाभ केवल 10ः समृद्ध लोगों को ही मिला है और बाकी के नब्बे प्रतिश्त के तो साधन ही कितने चले गये हैं। सरकार जिस तरह से बड़े पूंजीपतियों की पक्षधर होकर रह गयी है उसका सबसे बड़ा प्रमाण सरकार की विनिवेश योजना है। जिसके तहत अच्छी आय देने वाले राष्ट्रीय राजमार्गों, रेलवे ट्रैक, रेलवे स्टेशन, ट्रेन, हवाई अड्डे, बंदरगाह, ऊर्जा उत्पादन और ट्रांसमिशन, तेल और गैस पाइपलाइनज, टेलीकॉम इंफ्र्रास्ट्रक्चर तथा खनिज और खानों को निजी क्षेत्र में सौंपकर इससे छःलाख करोड़ जुटाने की योजना है। इसी विनिवेश के तहत सरकारी बैंकों को भी प्राइवेट सैक्टर को देने का विधेयक लाया जा रहा था जिसे बैंक कर्मचारियों की हड़ताल और पांच राज्यों में होने वाले चुनावों में इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका से टाल दिया गया। लेकिन देश के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के साथ अदानी कैपिटल की हुई हिस्सेदारी से इसका श्रीगणेश कर दिया गया है।
बैंकिंग देश की रीढ़ की हड्डी मानी जाती है लेकिन इस सरकार के कार्यकाल में 2014 -15 से 2020-2021 तक कमर्शियल बैंकों का एनपीए दो लाख करोड़ से बढ़कर 25.24 लाख करोड़ तक पहुंच गया। लेकिन इनमें रिकवरी केवल 593956 करोड़ ही हो पायी है जबकि 10,72116 करोड़ की कर्ज माफ कर दिया गया। इसी तरह सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का एनपीए इसी अवधि में 1904350 करोड़ को पहुंच गया जिसमें रिकवरी सिर्फ 448784 करोड़ और इसमें 807488 करोड़ का कर्ज इसमें माफ किया गया है। यह सारे आंकड़े आरबीआई से 13.8.21 की एक आरटीआई के माध्यम से सामने आये हैं। इन आंकड़ों से यह सामने आया है कि इस सरकार के कार्यकाल में करीब बीस लाख करोड़ का कर्ज माफ कर दिया गया। इसी कर्ज माफी का परिणाम है कि बैंकों में जमा पूंजी पर लगातार ब्याज कम होता जा रहा है और बैंकों की सेवाएं लगातार महंगी होती जा रही हैं। महंगाई और बेरोजगारी भी इसी सबका परिणाम है। ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि जिस दिन यह चिन्हित अदारे पूरी तरह से प्राइवेट सैक्टर के हवाले हो जायेंगे उस दिन महंगाई और बेरोजगारी का आलम क्या होगा।
इस सारे खुलासे के बाद यह सवाल जवाब मांगते हैं कि क्या इस सब पर देश के अंदर एक सार्वजनिक बहस नहीं हो जानी चाहिये थी? सरकारी संपत्तियों को प्राइवेट सैक्टर के हवाले करके कितनी देर देश को चलाया जा सकेगा? जिस देश के बैंकों की हालत यहां तक पहुंच गयी है कि 22219 ब्रांचों वाले स्टेट बैंक ऑफ इंडिया को 60 ब्रांचों वाले अदानी कैपिटल को अपना लोन पार्टनर बनाना पड़ा है यदि वहां के बैंक प्राइवेट हाथों में चले जायें तो आम आदमी का पैसा कितनी देर सुरक्षित रह पायेगा? प्राइवेट बैंक गरीब आदमी को क्यों और किन शर्तों पर कर्ज उपलब्ध करावायेगा? क्या इस वस्तुस्थिति का देर-सवेर हर आदमी पर असर नहीं पड़ेगा? क्या इन सवालों को हिन्दू-मुस्लिम करके नजरअंदाज किया जा सकता है? क्या राम मंदिर, काशी विश्वनाथ कॉरीडोर और मथुरा में कृष्ण मूर्ति रखने से महंगाई और बेरोजगारी के प्रश्न हल हो जायेंगे? आज जो नेता और राजनीतिक दल इन सवालों पर मौन धारण करके बैठ गये हैं क्या उनके हाथों में देश सुरक्षित रह पायेगा? क्या ऐसे परिदृश्य में आज संसद से लेकर हर गली चौराहे तक इन सवालों पर बहस नहीं होनी चाहिये?
घातक होगा सार्वजनिक सवालों पर बहस से भागनावोटर आईडी को आधार कार्ड से जोड़ने का विधेयक लोकसभा में बिना बहस के पारित हो गया है। इसे चुनाव सुधारों की दिशा में एक बड़ा कदम कहा जा रहा है। इस विधेयक को लोकसभा में लाये जाने से पहले चुनाव आयोग और पीएमओ के बीच एक बैठक होने का विवाद भी उभरा था। इस विवाद के परिदृश्य में यदि इस चुनाव सुधार पर संसद में बहस हो जाती तो अच्छा होता। लेकिन ऐसा हो नही पाया। शायद इस सरकार की यह संस्कृति ही बन गयी है कि विपक्ष की कोई भी बात सुननी ही नहीं है। जिस तरह से प्रधानमंत्री भी केवल अपने मन की ही बात जनता को सुनाने के सिद्धांत पर चलते आ रहे हैं उनकी सरकार भी उन्हीं के नक्शे कदम पर चल रही है। दर्जनों उदाहरण इस चलन के नोटबंदी से लेकर कृषि कानूनों के पास होने से लेकर उनके वापिस होने तक के मौजूद हैं। इस चलन में सबसे बड़ी कमी यही होती है कि आप हर बार हर समय ठीक नहीं हो सकते। आर्थिक क्षेत्र में जितने भी फैसले लिये गये हैं उनका ठोस लाभ केवल 10ः समृद्ध लोगों को ही मिला है और बाकी के नब्बे प्रतिश्त के तो साधन ही कितने चले गये हैं। सरकार जिस तरह से बड़े पूंजीपतियों की पक्षधर होकर रह गयी है उसका सबसे बड़ा प्रमाण सरकार की विनिवेश योजना है। जिसके तहत अच्छी आय देने वाले राष्ट्रीय राजमार्गों, रेलवे ट्रैक, रेलवे स्टेशन, ट्रेन, हवाई अड्डे, बंदरगाह, ऊर्जा उत्पादन और ट्रांसमिशन, तेल और गैस पाइपलाइनज, टेलीकॉम इंफ्र्रास्ट्रक्चर तथा खनिज और खानों को निजी क्षेत्र में सौंपकर इससे छःलाख करोड़ जुटाने की योजना है। इसी विनिवेश के तहत सरकारी बैंकों को भी प्राइवेट सैक्टर को देने का विधेयक लाया जा रहा था जिसे बैंक कर्मचारियों की हड़ताल और पांच राज्यों में होने वाले चुनावों में इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका से टाल दिया गया। लेकिन देश के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के साथ अदानी कैपिटल की हुई हिस्सेदारी से इसका श्रीगणेश कर दिया गया है। बैंकिंग देश की रीढ़ की हड्डी मानी जाती है लेकिन इस सरकार के कार्यकाल में 2014 -15 से 2020-2021 तक कमर्शियल बैंकों का एनपीए दो लाख करोड़ से बढ़कर 25.24 लाख करोड़ तक पहुंच गया। लेकिन इनमें रिकवरी केवल 593956 करोड़ ही हो पायी है जबकि 10,72116 करोड़ की कर्ज माफ कर दिया गया। इसी तरह सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का एनपीए इसी अवधि में 1904350 करोड़ को पहुंच गया जिसमें रिकवरी सिर्फ 448784 करोड़ और इसमें 807488 करोड़ का कर्ज इसमें माफ किया गया है। यह सारे आंकड़े आरबीआई से 13.8.21 की एक आरटीआई के माध्यम से सामने आये हैं। इन आंकड़ों से यह सामने आया है कि इस सरकार के कार्यकाल में करीब बीस लाख करोड़ का कर्ज माफ कर दिया गया। इसी कर्ज माफी का परिणाम है कि बैंकों में जमा पूंजी पर लगातार ब्याज कम होता जा रहा है और बैंकों की सेवाएं लगातार महंगी होती जा रही हैं। महंगाई और बेरोजगारी भी इसी सबका परिणाम है। ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि जिस दिन यह चिन्हित अदारे पूरी तरह से प्राइवेट सैक्टर के हवाले हो जायेंगे उस दिन महंगाई और बेरोजगारी का आलम क्या होगा। इस सारे खुलासे के बाद यह सवाल जवाब मांगते हैं कि क्या इस सब पर देश के अंदर एक सार्वजनिक बहस नहीं हो जानी चाहिये थी? सरकारी संपत्तियों को प्राइवेट सैक्टर के हवाले करके कितनी देर देश को चलाया जा सकेगा? जिस देश के बैंकों की हालत यहां तक पहुंच गयी है कि 22219 ब्रांचों वाले स्टेट बैंक ऑफ इंडिया को 60 ब्रांचों वाले अदानी कैपिटल को अपना लोन पार्टनर बनाना पड़ा है यदि वहां के बैंक प्राइवेट हाथों में चले जायें तो आम आदमी का पैसा कितनी देर सुरक्षित रह पायेगा? प्राइवेट बैंक गरीब आदमी को क्यों और किन शर्तों पर कर्ज उपलब्ध करावायेगा? क्या इस वस्तुस्थिति का देर-सवेर हर आदमी पर असर नहीं पड़ेगा? क्या इन सवालों को हिन्दू-मुस्लिम करके नजरअंदाज किया जा सकता है? क्या राम मंदिर, काशी विश्वनाथ कॉरीडोर और मथुरा में कृष्ण मूर्ति रखने से महंगाई और बेरोजगारी के प्रश्न हल हो जायेंगे? आज जो नेता और राजनीतिक दल इन सवालों पर मौन धारण करके बैठ गये हैं क्या उनके हाथों में देश सुरक्षित रह पायेगा? क्या ऐसे परिदृश्य में आज संसद से लेकर हर गली चौराहे तक इन सवालों पर बहस नहीं होनी चाहिये

लेखक बलदेव शर्मा

Baldev Sharma

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button