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इस सियासी “मजबूरी” का स्वागत करना चाहिए..,,अखिलेश यादव को भी लड़ना पड़ रहा है चुनाव

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इस सियासी “मजबूरी” का स्वागत करना चाहिए..
अखिलेश यादव को भी लड़ना पड़ रहा है चुनाव

चलो जी अखिलेश यादव भी आखिरकार विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं। या कह लो लडऩा पड़ रहा है। सीएम योगी आदित्यनाथ जो लड़ रहे हैं। पहली बार। इस बात से समाजवादी पार्टी में तगड़ी सुगबुगाहट थी। अब योगी जी चुनाव मैदान में कूदे तो अखिलेश को न चाहते हुए भी कूदना ही था। जो भी हो यह कूदा-फांदी लोकतंत्र के लिए तो अच्छी बात है।
एक चीज है भेड़चाल। इस चाल को खराब माना जाता है। लेकिन यूपी के परिेप्रेक्ष्य में इस भेड़चाल की सराहना की जानी चाहिए। वैसे इसे सियासी मजबूरी कहना ज्यादा सही रहेगा। असल में योगी आदित्यनाथ बिना विधानसभा चुनाव लड़े ही सीएम बने हैं। 2017 में सीएम बनाए गए तो उन्होंने विधान परिषद का आसान रास्ता चुना। वहां जनता नहीं विधायकों के द्वारा चुनाव होता है। मनोनीत भी होते हैं। इसी प्रकार अखिलेश भी 2012 में विधान परिषद के रास्ते से ही मुख्यमंत्री बने थे।
मैनें पिछली पोस्ट “योगी आदित्यनाथ कम से कम चुनाव तो लड़े रहे हैं”, में भी बताया था कि विघान परिषदों का क्या खेल होता है। जिन राज्यों में ये दो सदनों वाली प्रणाली है वहां सीएम बनने के लिए किसी एक का सदस्य होना जरूरी है। सो कई नेता आसान रास्ता चुनते रहे हैं जहां जनता के बीच न जाना पड़े। इस समय बिहार और महाराष्ट्र के सीएम भी ऐसे ही हैं। बिहार के सीएम नीतीश कुमार तो जब भी सीएम बने, विधानसभा चुनाव लड़े ही नहीं। उम्मीद की जानी चाहिए कि यूपी से निकली बात दूर महाराष्ट्र व बिहार तलक भी जाएगी।

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