*पाठकों के लेख*- *बलदेव शर्मा*; *शिमला स्मार्ट सिटी परियोजना के पूरा होने पर उठने लगे सवाल*
Bksood chief editor

शिमला स्मार्ट सिटी परियोजना के पूरा होने पर उठने लगे सवाल
एनजीटी के फैसले के बाद प्राइवेट निवेशक नहीं आ रहे आगे
क्या हजारों करोड़ का कर्ज लेकर पूरी की जानी चाहिए यह योजना
शिमला/शैल। नगर निगम शिमला के चुनाव से पहले इसके वार्डों की संख्या 34 से बढ़ाकर 42 की जा रही है। निगम क्षेत्र के साथ लगते छः पंचायतों के कुछ क्षेत्रों को इसमें मिलाकर नगर निगम का एरिया बढ़ाया जा रहा है। निगम प्रशासन का यह दावा है कि इन क्षेत्रों से इस आशय की मांग आयी है। जिसे स्वीकार करके शहरी विकास निदेशालय को भेज दिया गया है। माना जा रहा है कि सरकार जल्द ही इस प्रस्ताव को मानकर जिला प्रशासन से इसका पुनः सीमांकन करवा देगी। दूसरी ओर इस वार्ड बढ़ौतरी के खिलाफ ग्रामीण क्षेत्रों और शहर के भीतर भी दोनों तरफ रोष है। यह रोष इसलिए है कि निगम प्रशासन इस समय लोगों को आवश्यक सेवाओं की पूर्ति नियमित रूप से नहीं कर पा रहा है तो एरिया बढ़ने पर कैसे कर पायेगा। ग्रामीण क्षेत्रों में इसको लेकर रोष है कि नगर निगम में शामिल होते ही उन पर वह सारे शुल्क लागू हो जायेंगे जो निगम में देय हैं। यह रोष एकदम सही है और यह बढ़ौतरी कुछ राजनेताओं अधिकारियों के इशारे पर हो रही है। क्योंकि इन क्षेत्रों में कुछ बड़े राजनेताओं और अधिकारियों की संपत्तियां हैं। जिनके लिए निगम क्षेत्रों में मिलने वाली सुविधायें चाहिए।
इस समय की व्यवहारिक स्थिति यह है कि शिमला को स्मार्ट सिटी योजना के तहत लाया गया है। इस पर 2905 करोड़ का निवेश होगा। यहां पर दो सवाल खड़े होते हैं कि यह निवेश आयेगा कहां से और स्मार्ट सिटी को अवधारणा क्या है। स्मार्ट सिटी को इस तरह से परिभाषित किया गया है कि A smart city uses information and communication technology (ICT) to improve operational efficiency, share information with the public and provide a better quality of government service and citizen welfare. इस अवधारणा से स्पष्ट हो जाता है कि स्मार्ट सिटी के लिए जिस तरह के प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल किया जाना है उसके लिये निजी क्षेत्र की सेवाएं लेनी ही पड़ेगी। क्योंकि सब कुछ डिजिटल होना है। इसके लिये निजी क्षेत्र को जो पैसा दिया जायेगा उसका प्रबंध स्मार्ट सिटी प्रशासन को करना होगा। प्रशासन इसे उपभोक्ताओं से वसूलेगा। इस वसूलने में सारी सेवाएं बहुत महंगी हो जायेंगी। उस समय यह सामने आयेगा कि उपभोक्ता यह महंगी सेवायें ले पायेंगे या नहीं। निगम प्रशासन के पास आज ही आर्थिक साधन नहीं है। इस समय जलापूर्ति और गारवेज तथा स्ट्रीट लाइटों का प्रबंधन प्राइवेट सेक्टर के पास है और यह सेवायें लगातार महंगी होती जा रही है और सुचारू रूप से उपलब्ध भी नहीं हो पा रही हैं।
स्मार्ट सिटी परियोजना 2905 करोड़ की है। जिसमें केंद्र ने सिर्फ 500 करोड़ देने की बात की है। शेष 2500 करोड का प्रबंध सरकार और प्रबंधन को कर्ज उठाकर करना पड़ेगा। स्मार्ट सिटी के लिये नये निर्माण करने होंगे। लेकिन पर्यावरण संरक्षण और शिमला की भूकंपीय स्थिति को सामने रखते हुए एनजीटी ने यहां नये निर्माणों पर प्रतिबंध लगा रखा है। प्रदेश उच्च न्यायालय और प्रदेश सरकार को अनुमति नहीं दी गयी है। ऐसे स्मार्ट सिटी के नाम पर कैसे अनुमति मिल पायेगी यह सवाल बना हुआ है। एनजीटी के फैसले के कारण प्राइवेट क्षेत्र स्मार्ट सिटी में निवेश के लिए आगे नहीं आ रहे है। प्रदेश सरकार भी अपने साधनों से इतना निवेश करने की स्थिति में नहीं है। फिर स्मार्ट सिटी पर इतना निवेश करने के बाद भी यहां के हर घर तक फायरब्रिगेड और एंबुलेंस सेवा नहीं पहुंच पायेगी। ऐसे में यह सवाल बड़ा होता जा रहा है कि इतना कर्ज लेकर स्मार्ट सिटी बनाई जानी चाहिए? क्या नये क्षेत्रों को मिलाने से यह निवेश की समस्या सुलझ पायेंगी? क्या स्मार्ट सिटी प्रशासन के पास इतने कर्ज का ब्याज चुकाने और इसके लिए इस्तेमाल होने वाली प्रौद्योगिकी की सेवाओं का भार उठाने के संसाधन हो पायेंगे। इस परिदृश्य में आशंका बनी हुई है कि कहीं यह परियोजना बीच में ही बंद न हो जाये।
स्वतंत्र लेखक बलदेव शर्मा
