*पाठकों के लेख एवं विचार: लेखक, हेमांशु मिश्रा*


#रावी_चंबा_की_लाडली

#हेमांशु #मिश्रा
मां के बचपन की यादों में
रावी की याद पुरानी थी
चंबा से कुछ दूर
सरई घराट में
वो रात घनी अंधियारी थी
देर रात को
जमुना फुलां पूनी गउओं की
आवाज़ लगी डराने थी
रावी का पानी एकदम
छोर तोड़ कर
आंगन में घुस आया था
भाग्य से घर के अंदर सोए
नाना भी तब जाग गए
गउओं के देर रात
रम्भाने का मतलब
कुछ कुछ जान गए
सब को जगा
थोड़ा सा अनाज समेट कर
गउओं की रस्सी खोल
ऊंचे पहाड़ पर पत्थर के ओट में
गउओं ने जहां ठौर लिया
वहीं सात दिन काटे थे
आंखों के सामने
घर को बहते देख
रावी का रौद्र रूप भी देखा था
कलकल करती रावी ने
उस दिन उत्पात मचाया था
खुशकिस्मत थे गउओं के कारण
जीवन उस दिन बच पाया था
आज रावी के
एक छोर में
बैठा मैं
निहार रहा हूँ
रावी की टेढ़ी मेढ़ी चाल में
मां की यादों से
चंबा और उनके संघर्षो को खंगाल रहा
सायें सायें की आवाज़ में रावी
काफी कुछ कह जाती है
चंबा की यह लाडली रावी
मिंजर को खुद में समाती है
बड़ा भंगाल से निकली रावी
हज़ार वर्ष के चंबा को निखार रही