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*Editorial:आखिर कब तक हम इस देश में आवारा लावारिस तथा खूंखार सड़क पर घूमते हुए पशुओं का आतंक सहन करते रहेंगे?

 

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*Editorial:आखिर कब तक हम इस देश में आवारा लावारिस तथा खूंखार सड़क पर घूमते हुए पशुओं का आतंक सहन करते रहेंगे?

आखिर कब तक हम इस देश में आवारा लावारिस तथा खूंखार सड़क पर घूमते हुए पशुओं का आतंक सहन करते रहेंगे। इस तस्वीर में आप जिस आदमी की फोटो देख रहे हैं वह आज सुबह अपने घर से सैर करने के लिए निकले क्योंकि इनकी तबीयत ठीक नहीं थी और डॉक्टर ने घूमने के लिए कहा है ।अभी ये दो चार सौ मीटर ही निकले थे कि एक आवारा सांड ने इन पर हमला कर दिया और इन्हें बुरी तरह से घायल कर दिया ।
यह शुक्र है कि अपने घर से बहुत अधिक दूर नहीं गए थे सांड के हमले से चीखने चिल्लाने पर इनके घर वाले एकदम इनके पास पहुंचे ,और उस सांड से उनको बचाया ।
सोचिए अगर यह घर से दूर निकल गए होते विरान जगह में होते अकेली जगह में होते तो इनको कौन बचाता है? शायद उस सांड से भगवान भी ना बचा पाता ? दुख की बात यह है कि यह अभी अभी पैरालिसिस अटैक से उभरे हैं, अभी भी इनका हाथ ढंग से नहीं चल रहा है। ऊपर से इस सांड ने इन्हें और बेहाल कर दिया ।
जो लोग आवारा कुत्तों के ,आवारा बंदरों की तथा आवारा पशुओं की प्रति सहानुभूति रखते हैं उनके पास इस बात का कुछ स्पष्टीकरण या तर्क है कि इस इंसान का जीवन अधिक महत्वपूर्ण है या उस सांड का जीवन ?
आए दिन खबरें मिलती हैं कि इन आवारा बंदरों कुत्तों और पशुओं के कारण लोगों की जाने जा रही हैं ।अभी 6-7 दिन पहले ही शिमला में एक युवती ने तीसरी मंजिल से बंदरों के डर के मारे छलांग लगा दी और वह अपनी जान से हाथ धो बैठी।
बंदर अक्सर बच्चों को अपना शिकार बनाते हैं दुपहिया वाहन वाले कई बार इनके उत्पात का शिकार हो चुके हैं और अपनी जान गवा चुके हैं ।
अभी कुछ दिन पहले ही एक वीडियो वायरल हो रहा था जिसमें आवारा कुत्तों ने एक बुजुर्ग पर सुबह-सुबह हमला बोल दिया और वह अपनी जान से हाथ धो बैठे थे। जान की कीमत सभी की है अगर जानवरों की जान की कीमत है तो इंसान की जान की कीमत भी समझनी चाहिए ।
सरकार को इस विषय में गंभीरता से सोचना चाहिए कि हम इस गंभीर समस्या से कैसे निजात पा सकते हैं।

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