*रजनीति और हम:- लेखक उमेश बाली*



रजनीति और हम
आजकल लोगो का राजनितिक दल बदलने का मौसम है , यह चुनाव तक चलेगा । कुछ दल विपक्ष के साथ होंगे कुछ सत्ता पक्ष के साथ । अभी यह ख़बर है कि अकाली ओर बीजेपी फिर इक्कठे हो रहे हैं । कोन किधर जाएगा यह पता नहीं । भारतीय संसदीय प्रणाली में यह खेल नया नही है । हम 75 साल से यही कुछ देख रहे हैं । इस मामले में हमने देखा था कि कांग्रेस की पहली टूट से जब यूवा तर्क कहे जाने वाले चंद्र शेखर जैसे नेता पार्टी से अलग हुए । इंदिरा गांधी का विरोध शुरू हुआ और अपने क्लाइमैक्स पर पहुंचा जब बिहार में भ्रष्टचार के आंदोलन को जेपी जैसा नेतृत्व मिला और लाखों लोग देहली में यह नारा लगाते हुए पहुंचे कि गद्दी छोड़ो के जनता आती है । इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले ने इन्दिरा गांधी पर आरोप सिद्ध करने के बाद उनका चुनाव अवैध घोषित कर दिया । इंदिरा गांधी ने अपनी कुर्सी के लिए आपात काल लगा कर पूरे विपक्ष को जेल में डाल दिया । नतीजा विरोध जनता में इतना प्रबल हुआ कि पूरा विपक्ष जनता पार्टी के रुप में एक जुट हो गया नतीजा 1977 में इंदिरा गांधी हार गई । लेकिन विपक्ष सरकार बनते ही महत्वकांक्षा जन्म लेने लगी नतीजा चौधरी चरण सिंह ने प्रधान मंत्री बनने के लिए पार्टी में टूट कर दी । जनता पार्टी लोक दल मे विभक्त हो गई , फिर उसके बाद इतनी दल बदल हुई जनता को मालूम है । फिर कांग्रेस 1980 में दोबारा जीती और हरियाणा कि पूरी जनता पार्टी भजन लाल के नेतृत्व में कांग्रेस में चली गई । हिमाचाल में भी टूट हुई और जनता पार्टी की सरकार टूट गई । आया राम गया राम हरियाणा से शुरू हुआ । इतना बड़े पैमाने पर दल बदल होने लगा की जनता हैरान रह गई । राजीव गांधी ने anti defection Bill ला कर इसमें कुछ रोक लगाई अपने कार्यकाल में । इसके बाद जनता दल की सरकार बनी और टूट हुइ तो इतने जनता दल बन गए कि गिनती याद नही रही ।1980 में जनसंघ अलग हुआ और उसका नाम बीजेपी रखा गया । आखिर इस टूट से एक लाभ यह हुआ कि कांग्रेस का राज्यों में बर्चस्व समाप्त हो गया । सबसे बडा झटका कांग्रेस को कांशी राम और मायावती से लगा जो उसका वोट बेंक छीन लिया । इसके बाद पैदा हुआ क्षेत्रीय पार्टियों का चलन और पारिवारिक पार्टियों ने जन्म लिया । यह सर्वविदित है । बीच में सत्ता का खेल चलता रहा नेता लोग पार्टियां बदलते रहे । शायद जनता ऊब चुकी है और उसके पास सीमित विकल्प हैं और जो हैं उनमें नैतिकता नही है । भ्रष्टचार चरम पर कोई भी पवित्र नही सभी कम या अधिक इसमें लिप्त हैं । कुछ सुधार भी हुए लेकिन नाकाफी हैं । भ्रष्टचार के मुद्दे उछाले जाते है लेकिन सजा बहुत कम रिकवरी का भी यही हाल है। किसी भी जांच का अंजाम तक पहुंचने में एक चौथाई सदी बीत जाती है और भ्रष्ट , डकैत , कातिल और ब्लातकार के आरोपित नेता सत्ता सुख लेते रहते है और शोषित जनता की छाती पर मूंग दलते रहते है । धीरे धीरे जनता को भी लालची बना दिया गया और कार्यकर्ता भी । सुना है अब कुछ खास कार्यकर्ताओं को वेतन भी दिया जाता है या ऐसे पद दिए जाते हैं जहां उनका हलवा चलता रहे । हर राजनितिक नेता अपने आदमी को वेतन पर अपना पीएस भी रखता है । लेकिन जनता को भ्रमित करने के लिए और जनता कि स्वतंत्र सोच पर काबू रखने के लिए भावुक मुद्दे उछाले जाते हैं । मैं हैरान होता हूं भावुकता में बड़े बड़े विद्वान भी बह जाते हैं। आजादी के 75 सालों में महिलाए सर पर पानी ढोने को मजबूर है । सरकारी नलों में अगर पानी है तो पीने लायक नही, कोई बेहतर water treatment plant नही । बिजली का भी कुछ वैसा ही हाल जहां वोल्टेज कम है तो बरसों से है । दस बीस किलोमीटर की हवा से पोल गिर जाते है , बिजली के चमकने से बिजली ही डर जाती है । कूड़ा करकट न जनता को समझ न सरकार के पास निष्पादन की कोई योजना । लोगो की आंखों में धूल झोंकने के लिए अब मुफ्त की रिश्वत और जनता को यह नही पता कि खर्चा निकलना उनकी जेब से है । बस राजनितिक मंचो से लच्छेदार भाषण फिलहाल बहुत से भ्रष्टचार के आरोपी महाराष्ट्र में सरकार में शामिल हो गए , सरकार खुश कार्यकर्ता खुश । यह साबित हो रहा है और हम 75 साल से देख रहे हैं कि राजनीति कोई संत बनने के लिए नही होती अपितु संत भी राजनीतिज्ञ बन जाते हैं । नैतिकता की बात नही रही । जो नैतिकता से नही गिरते वर्तमान में कुर्सी से गिर जाते हैं । हर कदम पर समझोते हैं , धोखे हैं और जनता इधर की हो या उधर की राजनेतिक दलों ने धर्मो में उलझा कर सोच पर ही काबू कर लिया है ।

धन्यवाद । उबाली ।