पाठकों के लेख एवं विचार

*भारतीय खान पान*

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Umesh Bali Tct

हम सब लोग बाजार में , ढाबों मे , रेस्तरां में , होटलों में , मिठाइयां , फल सब्जियां बाजार से ला कर खाते रहते हैं । लेकिन अफसोस जनक बात यह है कि इस देश में शराब के लिए उसकी शुद्धता के नियम है लेकिन बेईमानी वहां पर भी हैं और लोग मरते हैं सुर्खियां भी बनती हैं , लेकिन food poison से कितने मरते हैं या बीमार होते हैं कोई ध्यान नहीं देता । क्योंकी कोई नियम ही नही जिसे लागू किया गया हो । नकली दूध नकली मावा या सडा हुआ मावा के इस्तेमाल की कोई रोक थाम नही । मिठाइयां कितनी पुरानी है कब से फ्रिज में पड़ी है कोई पता नहीं ।गोल गप्पे बेचने वालों के कभी हाथ देखिए पानी निकालते निकालते उंगलियों की सारी मैल लोग डकार जाते है फिर कहते है कुछ पेट ठीक नहीं । लोकल सोडे की बोतलों में गंदगी और पानी के लिए कोई नियम नहीं यहां तक की ब्रांडेड भी कभी कभी डेट एक्सपायर्ड बेच दिए जाते हैं । जो ब्रेड डेट एक्सपायर हो जाती है उसे खुदरा दुकानों से लेकर दोबारा पैक कर बेच दिया जाता है । आम तौर पर ब्रेड के स्लाइस में खटास की बू आती हे लेकिन हम आदि हो चुके हैं । गंदे तरीके से ब्रेड का गूंथा गया आटा देख कर भी हम खामोश । कभी भी स्वास्थ्य विभाग किसी बेकरी में इंस्पेक्शन करने नही जाता । जो रंग प्रतिबंधित है दुकानदार धडल्ले से इस्तेमाल करते हैं खाने की चीजों में । ढाबों मे माखियों की भरमार गंदे तवे पर सेंकी जाती रोटियां देख कर भी लोग खाते हैं । न तो परोसने वालों के लिए कोई नियम न बनाने वाले कुक के लिए । मेरे घर के समीप मंदिर है जहां तेल चढ़ाया जाता है उस गंदे तेल को खरीद कर पंजाब से ले जाते है फिर वो मार्केट में बिकता है कोई चेक नही । देसी घी का कुछ पता नहीं कि क्या क्या मिक्स होता है । किसी हलवाई के किचन में जाकर देखिए सड़ी हुई चाशनी में मधु मक्खियां या दूसरी माखियां दिखाई दे जायेंगी लेकिन हम खाते हैं । गर्मियों अक्सर धाम खाते समय कभी गौर कीजीए परोसने वालों का पसीना सब्जियों और चावलो में गिरता है । बनाने वाले वोटी कभी दस्तानों और सर पर किसी तरह का आइसोलेशन कैप नही लगाते । मैने जूतों समेत खाने की रसोई में लोगो को जाते और आते देखा । कोई ढंग का प्रबंध नही । हर तीसरा आदमी पेट की बीमारी से ग्रस्त है । अब फलों को लिजिए केमिकल , रसायन इस्तेमाल किए जाते हैं । इंजेक्शन दे कर साइज बड़े किए जाते हैं अब तो मीठा करने के लिएं भी इंजेक्ट करते हैं । सब्जियों की भी यही हालत । सारे का सारा जुगाड ही ऐसा है । हम चांद पर पहुंचने वाले हैं लेकिन जमीन पर क्या है । क्यो नही खान पान तैयार या बेचने वालों के लिए स्किल डेवलपमेंट का प्रोग्राम चला कर टेस्ट लेकर लाइसेंस इश्यू किया जाता । हर खान पान की दुकान के लिए कुछ नियम बना कर फिर इंस्पेक्शन कर लाइसेंस इश्यू होना चाहीए और विभाग 24 /7 निगरानी करे । खाना बनाने वाले व्यक्ती का मेडिकल होना चाहीए । क्यों देश को भीड़ के रुप में विकसित किया जा रहा है । उन हालातों को क्यों नही बदला जाता की खाने की बरबादी न हो । खाने को गंदगी ने बदलने से रोकना चाहीए जब मैं छोटा था तो बकरे को काटने से पहले वेटरनरी डॉक्टर चेक करता था अब ऐसा कुछ नही होता । मुर्गों की भी जांच नही । मिठाई की दुकानों के लिए अनिवार्य किया जाए जितनी मिठाई रोज बिकती है उतनी तैयार करे । मिठाई या खाने की चीज़ को देती बार दस्तानों का प्रयोग हो और निकालने या डिब्बे में डालती बार इंस्ट्रूमेंट्स का प्रयोग हो जो धुले हुए हों । गोलगप्पो वाले लोगो पर दस्तानों का और साफ़ पानी जरूरी किया जाए । खाने वाली दुकानों को जाली वाले दरवाजे लाजमी किए जाएं । सरकारें पीने के शुद्ध पानी के लिए कदम उठाएं , पानी के फिल्टर प्लांट्स का अधुनिकी करण करे और पानी के प्रबंध के लिए स्किल और तकनीक का प्रयोग करें । अगर जनता का खानपान और पानी ही शुद्ध नही तो विष्व गुरु कैसे अगर अर्थव्यवस्था पहले नंबर भी आ जाए। उबाली ।

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