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*”ईर्ष्या” आज के वर्तमान समाज पर एक व्यंग भरी रचना।*  *लेखक विनोद शर्मा वत्स*

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आज के वर्तमान समाज पर एक व्यंग भरी रचना।
                   (ईर्ष्या )

तू कितनी ईर्ष्या करती हैं सपनो से, अपनो से ।
तुझे क्या मजा आता है
दूसरे का दिल दुखा कर
दूसरे से ईर्ष्या करके ।
पता है ईर्ष्या
तेरी जुबान लंबी और खराब हो गई है
खराब तो पहले से थी अब और खराब हो गई है।
ऐसा क्यों करती हैं
अपनो के मुहँ से भी जहर उगलवाती है
ये अच्छी बात नही है ईर्ष्या
तू जलन और क्रोध में कुछ भी बोलती है
ईर्ष्या आज कल कुछ अपनो को भी अपना ज़हर देने लगी है
की डँसो
और जलन के ज़हर को अपने शब्दों में मिलाकर
एक दूसरे पर वार करो
एक को नीचा दिखओ
उसे ज़लील करो
इस काम मे सबसे बड़ा हाथ है
एक ऐसे दोस्त का
जो है तो ईर्ष्या
लेकिन दोस्त बनके एक दूसरे से लड़ाता रहता है
अपना उल्लू सीधा करके मज़े लेता है याद रख ज़हरीली ईर्ष्या
जिस दिन सब्र और ईमानदारी का दिमाग खराब हुआ
और तेरा पाप का घड़ा भरा
उस दिन तुझे
सब्र और ईमानदारी
तेरे घर तक छोड़ कर आयेगी
और सारे गिले शिकवे एक साथ मिटा आयेगी।
क्यों मंथरा और सुपर्णखा के काम करती हो
क्यों शकुनि को जवान करती हो
जिस दिन कृष्ण को पता चला
वो राम के संग आयेंगे
और
मंथरा  शूर्पनखा और शकुनि को ऐसा सबक सिखायेंगे
की राम और कृष्ण के नाम से ही घबरायेंगे।

विनोद शर्मा वत्स

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