प्रेम दिवस पर मेरी नई रचना ( मैं तुम्हारा शरीर था)
Tct chief editor
तुम्हारे प्रेम का उपहार तुम्हारे अधरों का प्यार मन को सुकून दिल को चैन देता है सोचता हूँ जब तुम्हारी मनमोहक छवि के बारे में दिल के सूने आसमान में एक तूफान उठने लगता है रेशम से तुम्हारे केश लगते है काले घुमड़ते बादल और जब उन बादलों से रिसती है मोती की लाडिया सच उन लड़ियों को अपनी अंजुरी में भर निहारता रहता हूँ तुम्हारे खूबसूरत अक्स को जो उन मोतियों में झलक रहा है सच उस वक़्त वक़्त ठहर जाता है चांद सितारों का समूह मेरी अंजुरी के इर्दगिर्द तुम्हारी तुम्हारी इक झलक पाने को आपस मे उलझ जाता है। जो मुझे बर्दाश्त नही इसलिये मैं अपनी अंजुरी को बंद कर उसे प्रेम के गिलास में डाल गटा गट पी जाता हूँ और तुम्हारी सुंदर छवि को अपने अंदर समा लेता हूँ क्योंकि हम और तुम अलग ही कब थे तुम मेरी आत्मा और में तुम्हारा शरीर था। मैं तुम्हारा शरीर था