*राहुल_गांधी_की_मानहानि_मामले_में-अपील-खारिज)-*



22 अप्रैल 2023- (#राहुल_गांधी_की_मानहानि_मामले_में-अपील-खारिज)-
इस मामले की समीक्षा करने से पहले मैने अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश आर पी मोगरा का 27 पेज का आदेश पढ़ कर समझने का प्रयास किया है। हालांकि मै जज साहब के द्वारा परिभाषित कानूनी और तकनिकी पहलुओं पर टिप्पणी करने मे सक्ष्म नहीं हूँ और न ही अधिकृत हूँ क्योंकि मै कानून का जानकार नहीं हूँ। राहुल गांधी ने राहत पाने के लिए जो तर्क दिए थे उसमे यह तर्क भी था कि वह सांसद है और देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के अध्यक्ष रह चुके है।उनका यह भी तर्क था कि यदि दोष सिद्धि पर रोक नहीं लगती तो उन्हे कभी भरपाई न होने वाली हानि हो सकती है, लेकिन जज पी मोगरा ने इन तर्कों को न मानते हुए कहा कि आप सासंद है और देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के नेता है इसलिए आप से अधिक जिम्मेदार व्यवहार की उम्मीद है। जज की बात सही है कि जिम्मेदार व्यक्ति को अपने शब्दों का चयन अधिक जिम्मेदारी से करना चाहिए। यह बात सही है कि आज कमर से नीचे वार करने वालो मे राहुल गांधी अपवाद नहीं है। पिछले दो दशकों मे राजनिति और राजनेताओं की भाषा का स्तर बहुत नीचे आ गया है। राहुल के विषय मे बात इतनी है कि उनके खिलाफ कोर्ट का फैसला आया है इस लिए उनकी भाषा की समीक्षा हो रही है। खैर किसी सर नेम को चोर कहना या चौकीदार चोर है जैसी भाषा की अपेक्षा उस व्यक्ति से नहीं की जा सकती है जो सासंद हो,दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के नेता हो और देश का प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा रखता हो।
जज ने राहुल के इस तर्क को भी नहीं माना कि यदि दोष सिद्धी पर रोक नहीं लगी तो भरपाई न होने वाली हानि हो जाएगी। इस पर जज ने कहा कि कांग्रेस नेता से उच्च नैतिक परम्पराओं के निर्वहन की अपेक्षा है। इस सन्दर्भ मे जज ने कांग्रेस के ही नवजोत सिद्धू का उदहारण देकर कहा कि जब सिद्धू को रोड रेज मामले मे सजा हुई तो उन्होने नैतिकता की पालना करते हुए अपनी संसद की सदस्यता छोड़ दी थी। खैर अभी राहुल के पास उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय जाने का विकल्प उपलब्ध है। मेरे विचार मे सार्वजनिक जीवन ने अपनी भाषा के लिए उपयुक्त शब्दों का चयन जरूरी है और जाने अनजाने मे यदि किसी को आपके शब्दो पर आपत्ति हो और वह आपके शब्दो से आहत महसूस करे तो खेद व्यक्त करने मे भी हर्ज नहीं है। इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाने की जरूरत नहीं है। इसी संदर्भ मे मुझे स्मरण आता है कि 2002 मे जब मै अपने साथ हुए अन्याय की लड़ाई लड़ रहा था और मित्र मंडली के विस्तार के लिए प्रदेश के प्रवास पर था तो मैने हमीरपुर की पत्रकार वार्ता मे एक बंदरी के स्वार्थ की कहानी सुनाई और अगले दिन एक प्रतिष्ठित दैनिक ने उस कहानी को गलत तरीके से तत्कालीन मुख्यमंत्री के साथ जोड़कर छाप दिया और मेरी बात का सारा संदर्भ ही बदल दिया। हालांकि मेरा दोष नहीं था फिर भी मैने उसकी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए खेद व्यक्त किया और तत्कालीन मुख्य मंत्री प्रेम कुमार धूमल जी को व्यक्तिगत पत्र लिखकर सफ़ाई दी, जबकि उनके साथ मेरा छत्तीस का आंकडा जगजाहिर था।

#आज_इतना_ही कल फिर नई कड़ी के साथ मिलते है।