पाठकों के लेख एवं विचार

*सुन_चंपा_सुन_तारा_कौन_जीता_कौन_हारा*

 

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14 मई 2023- (#सुन_चंपा_सुन_तारा_कौन_जीता_कौन_हारा)-

एग्जिट पोल सर्वे ने कर्नाटक के लिए जो भविष्यवाणी की थी वह सच साबित हुई और कांग्रेस पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता मे आ गई। कर्नाटक के 224 सीटों की विधानसभा मे कांग्रेस 136 सीटें जीत कर ले गई जबकि भाजपा 65 सीटों पर सिमट गई और जेडीएस का किंग मेकर बनने का सपना टूट गया वह केवल 19 सीटें ही जीत पाई। कांग्रेस की हिमाचल के बाद यह दूसरी बड़ी जीत है।मेरी समझ मे 2024 के लोकसभा के चुनाव से पूर्व दक्षिण भारत का द्वार समझे जाने वाला कर्नाटक का भाजपा के हाथ से निकल जाना भाजपा के लिए मतदाताओं की चेतावनी से कम नहीं है। कर्नाटक के चुनाव मे भाजपा ने अपनी पूरी ताकत झोंक रखी थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं 22 रैलियां और 6 रोड शो किए। राष्ट्रीय नेताओं ने 206 रैलियां 90 रोड शो कर भाजपा के चुनाव प्रचार को शिखर पर पहुंचा दिया था। हांलाकि कांग्रेस का चुनाव प्रचार हाई-प्रोफाइल नहीं था लेकिन वह चुनाव को स्थानीय मुद्दों के इर्द-गिर्द रखने मे सफल रही और कर्नाटक की भाजपा सरकार पर भ्रष्टाचार के मुद्दे को उछाल कर सरकार को 40% कमीशन की सरकार के तौर पर प्रचारित करने मे सफल रही।

भाजपा ने कांग्रेस की इस घोषणा को कि सत्ता मे आने पर बजरंग दल को प्रतिबंधित कर दिया जाएगा को बजरंगबली के साथ जोड़कर एक भावुक मुद्दा बनाने का प्रयास जरूर किया लेकिन परिणाम बता रहे है कि मतदाताओं ने स्थानीय मुद्दों और परिवर्तन के नाम पर 38 साल से चली आर रही परम्परा को निभाते हुए परिवर्तन कर दिया। खैर मतदाताओं ने कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत के साथ कर्नाटक मे सत्तारूढ़ किया है और भाजपा को अपनी कार्यशैली और हार के कारणों की समीक्षा करने के लिए कहा है। भाजपा को इस जनादेश को समझना चाहिए और इसकी विस्तृत समीक्षा करनी चाहिए। मेरी समझ मे भाजपा आज देश की सबसे बड़ी और शक्तिशाली पार्टी है जिसके पास कार्यकर्ताओ, नेताओ और संसाधनो की कोई कमी नहीं है, लेकिन संसाधनो के कारण भाजपा की कार्यपद्वती और सोच मे एक परिवर्तन आ गया है। भाजपा जो पहले सीमित संसाधनो पर निर्भर रहते हुए कार्यकर्ताओ के माध्यम से चुनाव अभियान को चलाती थी। अब सब कुछ आऊट सोर्स किया जाने लगा है। पी आर कंपनीज सारा प्रचार प्रसार करती है। वह ही चुनाव का प्रबंधन देखती है। यहां तक दृष्टिपत्र भी कंपनीज तैयार कर के देती है। सच्चाई तो यह है कि जहां भाजपा की सरकार होती है वहां रैलियों मे भीड प्रशासन जमा करता है और चुनाव के दौरान यह काम भी आऊट सोर्स कर दिया जाता है।

मेरे विचार मे अब संसाधनो के दम पर रैलियों द्वारा जुटाई गई बड़ी भीड मतदाताओं को प्रभावित नहीं करती है, क्योंकि अब सब को पत्ता है कि यह भीड पैसे के दम पर जुटाई गई है। पैसे के दम पर खड़ा किया गया हाई-प्रोफाइल प्रचार कार्यकर्ताओ को अतिआत्मविशवास से भर देता है और इसके चलते उनके व्यवहार मे शालीनता समाप्त हो जाती है। मेरे विचार मे अब समय आ गया है कि भाजपा को अपनी आऊट सोर्स की रणनीति पर पुनर्विचार करना होगा और एक बार फिर से अपने कर्मठ और ईमानदार कार्यकर्ताओ पर विश्वास करते हुए उनपर ही निर्भरता बढानी होगी।

Naval kishore tct :लेखक एवं संकलनकर्ता

#आज_इतना_ही कल फिर नई कड़ी के साथ मिलते है।

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