“चुनाव निगम के, मुद्दे जनता के” 🖋️✒️डॉक्टर लेखराज
5 साल बाद फिर आया वादों का मौसम, जनता के सवाल पहले से ज्यादा तीखे

“चुनाव निगम के, मुद्दे जनता के”

5 साल बाद फिर आया वादों का मौसम, जनता के सवाल पहले से ज्यादा तीखे
जिस प्रकार हर औजार की धार समय के साथ कुंद होती जाती है, उसी प्रकार नेताओं की पकड़ भी धीरे-धीरे जनता पर कमजोर पड़ती जाती है। यह कोई कहावत भर नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत बन चुकी है। अब जब नगर निगम और पंचायत चुनाव सिर पर हैं, तो पांच साल से दबे हुए सवाल फिर से सतह पर आ रहे हैं—और इस बार जनता सिर्फ सुनने के मूड में नहीं, जवाब मांगने के मूड में है।
सबसे बड़ा और ज्वलंत मुद्दा बनकर उभरा है स्मार्ट मीटर। जब से इन्हें लगाने की प्रक्रिया शुरू हुई है, विरोध भी उसी अनुपात में बढ़ा है। कई प्रदेशों में लोग सड़कों पर उतर आए हैं, अभियान चला रहे हैं, सवाल पूछ रहे हैं। लेकिन हिमाचल जैसे शांत प्रदेश में भी अब असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। लोगों का आरोप है कि उनकी सहमति के बिना, दबाव और पुलिस बल के साथ मीटर लगाए जा रहे हैं—यह लोकतंत्र की भावना के विपरीत है।
बिजली विभाग का तर्क है कि इससे चोरी रुकेगी। लेकिन आम आदमी का सवाल सीधा है—“चोरी करता कौन है?” जो ईमानदारी से 400–500 रुपये का बिल भरता आया है, अगर उसका बिल अचानक हजारों में पहुंच जाए, तो क्या वह मजबूरी में गलत रास्ता नहीं चुनेगा? ऐसे में क्या यह व्यवस्था सुधार है या नई समस्या की शुरुआत?
दूसरी ओर, यह पूरा मामला कहीं न कहीं निजीकरण की ओर भी इशारा करता दिखता है। विपक्ष चुप है क्योंकि योजना केंद्र से जुड़ी है, और सत्ता पक्ष इसलिए शांत है क्योंकि फायदे की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में जनता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है।
अब बात करें नगर निगम पालमपुर की, जहां लोगों को पांच साल पहले बड़े-बड़े सपने दिखाए गए थे—विकास, सुविधाएं, बेहतर जीवन। लेकिन हकीकत यह है कि कई वार्ड आज भी बुनियादी समस्याओं से जूझ रहे हैं।
पानी सड़कों पर बह रहा है, ड्रेनेज का कोई इंतजाम नहीं
कई जगह सड़कें वर्षों से टूटी पड़ी हैं, टारिंग तक नहीं हुई
बस सेवा जस की तस, कोई सुधार नहीं
बच्चों के लिए पार्क का सपना अधूरा
रेन शेल्टर और सार्वजनिक शौचालय जैसी बुनियादी जरूरतें भी पूरी नहीं
सबसे हैरानी की बात यह है कि कई लोगों को अपने ही काम खुद करवाने पड़े। किसी ने 63 हजार रुपये खर्च कर अपने घर का पानी सड़क से हटाने का इंतजाम किया, तो किसी ने खुद पाइप डलवाए। सवाल यह है कि जब जनता अपने ही पैसे से काम कर रही है, तो फिर प्रतिनिधियों की भूमिका क्या रह जाती है?
एक और बड़ा आरोप है चाटुकारिता और पक्षपात का। पिछले पांच साल में विकास कार्य वहां हुए जहां “अपने” लोग थे, बाकी क्षेत्र उपेक्षित रहे। ठेकेदारी हावी रही और जनता की जरूरतें पीछे छूटती गईं।
अब चुनाव फिर आ गए हैं। नेताओं के पास फिर वही वादों की सूची है, लेकिन इस बार जनता के पास सवालों की लंबी सूची है—
स्मार्ट मीटर पर कौन खुलकर बोलेगा?
क्या विकास बिना पक्षपात के होगा?
क्या बुनियादी सुविधाएं प्राथमिकता बनेंगी?
राजनीतिक समीकरण भी दिलचस्प हो सकते हैं। यह भी संभव है कि परिणाम चौंकाने वाले हों और कोई निर्दलीय उम्मीदवार “किंगमेकर” बन जाए।
अंत में, यह कहना गलत नहीं होगा कि
“जनता अब जाग रही है, और इस बार सिर्फ वादों से काम नहीं चलेगा।”
चुनाव के बाद ही पता चलेगा कि ऊंट किस करवट बैठता है, लेकिन इतना तय है कि इस बार मुद्दे असली हैं—और जनता उन्हें भुलाने वाली नहीं।

क्रमशः…


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