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*बेबाक पत्रकार उदय पठानिया: सवालों से संवाद तक, जनसरोकार को पत्रकारिता का केंद्र मानने वाली एक अलग पहचान*

कांगड़ा की पत्रकारिता से उभरा ऐसा नाम, जो सत्ता और व्यवस्था से सवाल पूछने को पत्रकारिता की जिम्मेदारी मानता है

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बेबाक पत्रकार उदय पठानिया: सवालों से संवाद तक, जनसरोकार को पत्रकारिता का केंद्र मानने वाली एक अलग पहचान

Tct ,bksood, chief editor

कांगड़ा की पत्रकारिता से उभरा ऐसा नाम, जो सत्ता और व्यवस्था से सवाल पूछने को पत्रकारिता की जिम्मेदारी मानता है

TRICITY TIMES संपादकीय।

पत्रकारिता केवल खबर लिख देने का नाम नहीं है। पत्रकारिता का वास्तविक अर्थ तब सामने आता है, जब कोई पत्रकार समाज के उन सवालों को अपनी आवाज देता है जिन्हें आम आदमी अकेले व्यवस्था तक नहीं पहुंचा पाता। जब कोई पत्रकार सत्ता, प्रशासन और प्रभावशाली लोगों के सामने खड़े होकर यह पूछता है कि जनता की समस्या का समाधान कब होगा, जिम्मेदारी किसकी है और जवाब कौन देगा—तभी पत्रकारिता अपने मूल उद्देश्य के करीब पहुंचती है। उदय पठानिया की सार्वजनिक पत्रकारिता को इसी नजरिए से देखा जा सकता है।

उदय पठानिया की पहचान कांगड़ा क्षेत्र से जुड़े पत्रकार के रूप में लंबे समय से सामने आती रही है। उनके पत्रकारिता सफर में रिपोर्टिंग के साथ प्रकाशन और संपादन की जिम्मेदारियां भी रही हैं। उपलब्ध सार्वजनिक रिकॉर्ड में उनके नाम से हिंदी मासिक ‘दरअसल’ का प्रकाशन दर्ज मिलता है, जबकि उनकी पत्रकारिता से जुड़े पुराने संदर्भों में हिमाचल दस्तक का नाम भी सामने आता है। बाद के वर्षों में वे स्वतंत्र पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया से जुड़े दिखाई देते हैं।

लेकिन उदय पठानिया की पहचान केवल उनके पद या किसी मीडिया संस्थान से जुड़ाव से नहीं बनती। उनकी एक अलग पहचान उनके सवाल पूछने के अंदाज से बनती है।

किसी बड़े नेता के सामने सवाल रखना हो, किसी अधिकारी से जवाब मांगना हो या किसी सार्वजनिक मुद्दे को चर्चा के केंद्र में लाना हो—उदय पठानिया का अंदाज सीधा है। उनकी बातचीत में कई बार सवाल गंभीर होते हैं, लेकिन उन्हें रखने का तरीका सहज, संवादात्मक और कभी-कभी व्यंग्यात्मक भी होता है। यही शैली बातचीत को सामान्य औपचारिक प्रश्नोत्तर से अलग बनाती है।

उनकी पत्रकारिता में एक खास बात यह दिखाई देती है कि सवाल केवल सवाल के लिए नहीं होता। सवाल के पीछे अक्सर कोई जनता का मुद्दा होता है।

गरीब परिवार की परेशानी हो, पीड़ित व्यक्ति की आवाज हो, किसी गांव की समस्या हो, रोजगार और पलायन का विषय हो या व्यवस्था से जुड़ा कोई सवाल—ऐसे विषय पत्रकारिता को केवल समाचार से आगे ले जाते हैं। पत्रकार और जनता के बीच यही रिश्ता लोकतांत्रिक संवाद की महत्वपूर्ण कड़ी बनता है।

उदय पठानिया की शैली का एक और पहलू है—वे सवाल को घुमाकर कमजोर नहीं करते। सामने व्यक्ति कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, पत्रकार का काम प्रश्न पूछना है। उनके सार्वजनिक संवादों में यह शैली कई अवसरों पर दिखाई देती है। कभी सीधे सवाल, कभी तंज के माध्यम से सवाल और कभी ऐसी बात जो सुनने वाले को मुस्कुराने के साथ-साथ सोचने पर भी मजबूर कर दे—यह उनके संवाद की विशेषता मानी जाती है।

यही कारण है कि उनकी पत्रकारिता को केवल ‘बेबाक’ शब्द से समझना पर्याप्त नहीं होगा। उनके लिए बेबाकी का अर्थ केवल तेज आवाज में बोलना नहीं, बल्कि सवाल को सवाल की तरह सामने रखना है।

पत्रकारिता में सत्ता से सवाल करना आसान काम नहीं माना जाता। सत्ता किसी एक दल या व्यक्ति का नाम नहीं है। सरकार, प्रशासन, राजनीतिक संगठन, संस्थाएं और प्रभावशाली सार्वजनिक व्यक्ति—सभी लोकतांत्रिक व्यवस्था के अलग-अलग हिस्से हैं। पत्रकार की भूमिका इन सभी से सवाल पूछने और जनता के सामने उपलब्ध जवाब रखने की है। इस दृष्टि से उदय पठानिया की पत्रकारिता का वह पक्ष उल्लेखनीय है जिसमें वे सवाल को व्यक्तिगत टकराव की जगह सार्वजनिक जवाबदेही के संदर्भ में रखते दिखाई देते हैं।

उनकी पत्रकारिता का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष स्थानीयता है।

कांगड़ा और हिमाचल की जमीन से जुड़े मुद्दों को उठाना उनके सार्वजनिक कार्य का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। पहाड़ी भाषा और स्थानीय पहचान से जुड़े विषयों पर भी उनके संवाद का उल्लेख प्रकाशित सामग्री में मिलता है। स्थानीय भाषा में जनता और नीति-निर्माताओं के बीच संवाद की जरूरत पर जोर देना हिमाचल जैसे राज्य में विशेष महत्व रखता है, जहां भाषा केवल संचार का माध्यम नहीं बल्कि संस्कृति और सामाजिक पहचान से भी जुड़ी हुई है।

उदय पठानिया की सार्वजनिक यात्रा में सामाजिक सक्रियता का पक्ष भी दिखाई देता है। उनके बारे में प्रकाशित समाचारों में अलग-अलग समय पर सामाजिक और सार्वजनिक गतिविधियों में उनकी भागीदारी का उल्लेख मिलता है। इससे यह संकेत मिलता है कि उनका सार्वजनिक सरोकार केवल न्यूज़ रूम तक सीमित नहीं रहा, बल्कि समाज के विभिन्न विषयों के साथ भी उनका जुड़ाव रहा है।

एक पत्रकार के लिए सबसे बड़ी पूंजी उसका विश्वास होता है। कैमरा, माइक्रोफोन, वेबसाइट या सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पत्रकार को दिखाई देने का माध्यम दे सकते हैं, लेकिन जनता का भरोसा केवल लगातार और जिम्मेदार पत्रकारिता से बनता है। सच के पक्ष में खड़े होने का दावा करना आसान है, लेकिन हर परिस्थिति में तथ्य और जनहित को प्राथमिकता देना ही उस दावे की असली परीक्षा है।

उदय पठानिया के संदर्भ में यही बात उनकी सार्वजनिक छवि के साथ जुड़ी हुई दिखाई देती है। वे पत्रकारिता को केवल पेशे के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक संवाद के माध्यम के रूप में प्रस्तुत करते हैं। बड़े से बड़े व्यक्ति के सामने सवाल पूछना हो या आम आदमी की आवाज को मंच देना—उनकी शैली में प्रश्न पूछने की स्पष्टता दिखाई देती है।

और शायद यही पत्रकारिता का सबसे महत्वपूर्ण धर्म भी है।

पत्रकार का व्यक्तिगत विचार हो सकता है, उसकी अपनी सामाजिक या वैचारिक समझ हो सकती है, लेकिन समाचार और पत्रकारिता के स्तर पर तथ्य, जनहित और जवाबदेही को प्राथमिकता देना आवश्यक है। देशहित का अर्थ भी यही है कि पत्रकार किसी व्यक्ति विशेष से ऊपर संस्थाओं, संविधान, समाज और जनता के हित को महत्व दे।

सच्ची पत्रकारिता किसी नेता की प्रशंसा करने या किसी नेता का विरोध करने तक सीमित नहीं होती। सच्ची पत्रकारिता का काम है—सवाल पूछना, जवाब दर्ज करना, तथ्य सामने रखना और जनता को अपना निष्कर्ष निकालने देना।

उदय पठानिया की पत्रकारिता में इसी सवाल पूछने वाली शैली की अपनी पहचान है। उनकी बातचीत में व्यंग्य हो सकता है, सवालों में धार हो सकती है और संवाद का अंदाज सहज हो सकता है, लेकिन पत्रकारिता का मूल्य तभी कायम रहता है जब उसके केंद्र में जनता का मुद्दा और तथ्य मौजूद हों।

आज जब मीडिया के सामने अनेक तरह के दबाव, व्यावसायिक चुनौतियां और डिजिटल दौर की तेज प्रतिस्पर्धा है, ऐसे समय में स्वतंत्र पत्रकारिता का महत्व और बढ़ जाता है। पत्रकार को किसी भी दबाव से ऊपर उठकर अपनी पेशेवर जिम्मेदारी निभानी होती है।

उदय पठानिया की सार्वजनिक पत्रकारिता यात्रा इसी सवाल को सामने रखती है कि पत्रकारिता आखिर किसके लिए है—सत्ता के लिए या समाज के लिए?

TRICITY TIMES की संपादकीय दृष्टि में इसका उत्तर स्पष्ट है—पत्रकारिता जनता के लिए है।

और जो पत्रकार जनता के सवालों को सत्ता और व्यवस्था के दरवाजे तक पहुंचाने का प्रयास करता है, वह लोकतांत्रिक संवाद को मजबूत करने में अपनी भूमिका निभाता है। उदय पठानिया की पत्रकारिता की पहचान भी इसी सवाल पूछने वाली परंपरा से जुड़ी हुई दिखाई देती है।

सवाल पूछते रहना, जवाब मांगते रहना और जनता की आवाज को मंच देना—यही पत्रकारिता की असली ताकत है।

ट्राई सिटी टाइम्स की तरफ से उदयबीर पठानिया जी को उज्ज्वल भविष्य के लिए हार्दिक शुभकामनाएं !👍💐

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