राय बहादुर जोधा मल कुठियाला जी — सेवा, परोपकार और समाज निर्माण की अमिट विरासत


राय बहादुर जोधा मल कुठियाला जी — सेवा, परोपकार और समाज निर्माण की अमिट विरासत

1. राय बहादुर जोधा मल कुठियाला जी का जन्म 23 नवंबर 1883 को होशियारपुर जिले के हरौली गांव में हुआ था। वे उत्तर भारत के एक प्रतिष्ठित व्यावसायिक परिवार से संबंधित थे। उन्होंने अपने व्यावसायिक जीवन की शुरुआत शिमला में पारिवारिक कारोबार से की और अपनी दूरदर्शिता, मेहनत, ईमानदारी तथा कुशल व्यावसायिक नेतृत्व के बल पर कारोबार का विस्तार आसपास के राज्यों तक किया। ऐतिहासिक अभिलेखों में उनके नाम से जुड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और कंपनियों का उल्लेख भी मिलता है। �
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लेकिन राय बहादुर जोधा मल कुठियाला जी की सबसे बड़ी पहचान केवल एक सफल व्यवसायी के रूप में नहीं, बल्कि एक महान दानी, समाजसेवी और परोपकारी व्यक्तित्व के रूप में बनी। उन्होंने अपने जीवन में व्यक्तिगत लाभ से ऊपर उठकर सार्वजनिक संस्थाओं और मानव कल्याण के कार्यों को महत्व दिया। शिक्षा, चिकित्सा, छात्रवृत्तियों, डिस्पेंसरी, धर्मशालाओं और धर्मार्थ संस्थाओं के लिए उनके योगदान का उल्लेख मिलता है। �
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उनके परोपकारी कार्यों का प्रभाव पंजाब, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल के विभिन्न क्षेत्रों तक रहा। उपलब्ध विवरण के अनुसार, उन्होंने टांडा में 400 बिस्तरों वाले क्षय रोग सेनेटोरियम एवं चिकित्सालय की स्थापना के लिए सरकार को 47 एकड़ भूमि दान की थी। होशियारपुर में उनके नाम से लाला जोधा मल कुठियाला ट्यूबरकुलोसिस क्लिनिक का उल्लेख 1961 की जिला जनगणना रिपोर्ट में भी मिलता है। �
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धर्मशाला के डीपो बाजार में भी उनके द्वारा एक सराय का निर्माण करवाए जाने का उल्लेख मिलता है, जिसका उद्घाटन 14 मई 1942 को श्री स्वामी सत्यनंद जी महाराज द्वारा किया गया था।
शिक्षा के क्षेत्र में भी उनका योगदान उल्लेखनीय रहा। जरूरतमंद विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्तियां प्रदान करना उनकी सेवा भावना का महत्वपूर्ण हिस्सा था। उनके द्वारा स्थापित या समर्थित परंपरा से जुड़ी छात्रवृत्ति और शैक्षणिक गतिविधियों का प्रभाव बाद की पीढ़ियों तक पहुंचा। आज भी Jodhamal Public School, Jammu की आधिकारिक वेबसाइट उन्हें परिवार की सामाजिक प्रतिबद्धता और सार्वजनिक सेवा की परंपरा का आधार मानती है। �
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समाज के संगठन और सामुदायिक कार्यों में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही। 1930 में होशियारपुर में आयोजित सर्वदेशिक सूद सभा के सम्मेलन की अध्यक्षता राय बहादुर लाला जोधा मल कुठियाला जी ने की थी। उस दौर में ऐसे सम्मेलनों के माध्यम से शिक्षा, छात्रवृत्ति तथा जरूरतमंद परिवारों की सहायता जैसे सामाजिक कार्यों को बढ़ावा दिया जाता था। �
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उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि धन और सफलता की वास्तविक सार्थकता समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने में है। उन्होंने अपने समय में शिक्षा, चिकित्सा, जनसेवा और सामुदायिक कल्याण के लिए जो योगदान दिया, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बन गया।
राय बहादुर जोधा मल कुठियाला जी का निधन 9 अक्टूबर 1961 को हुआ, लेकिन उनके नाम से जुड़ी सामाजिक और शैक्षणिक विरासत आज भी उनके सेवा-भाव की याद दिलाती है। उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि उनकी संपत्ति नहीं, बल्कि वह सेवा की परंपरा है जिसे उन्होंने समाज के लिए छोड़ा।
🙏 श्रद्धांजलि
ऐसे महान दानी, समाजसेवी और परोपकारी व्यक्तित्व को शत-शत नमन। उनकी सेवा भावना आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करती रहे।
2. टांडा का इतिहास मत मिटाइए: जिस समाजसेवी ने नींव रखी, उसका नाम याद रखना हमारी जिम्मेदारी है
इतिहास केवल उन इमारतों का नाम नहीं होता जो आज हमारे सामने खड़ी हैं। इतिहास उन लोगों के त्याग, संकल्प और सेवा का भी नाम है, जिन्होंने कभी उस इमारत की पहली ईंट रखी थी।
टांडा का इतिहास भी ऐसी ही एक महान समाजसेवी शख्सियत से जुड़ा है—राय बहादुर जोधामल कुठियाला।
आज टांडा को मुख्य रूप से डॉ. राजेंद्र प्रसाद सरकारी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के रूप में जाना जाता है। लेकिन इस विशाल चिकित्सा संस्थान की कहानी अचानक 1996 में शुरू नहीं हुई थी। इसकी जड़ें उससे कई दशक पहले के उस दौर में जाती हैं, जब टी.बी. जैसी बीमारी समाज के लिए एक बड़ी चुनौती थी।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद सरकारी मेडिकल कॉलेज की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, राय बहादुर जोधामल कुठियाला की पहल से टांडा में टी.बी. सैनिटोरियम शुरू हुआ, जिसका उद्घाटन 21 मई 1958 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने किया था। यह एक स्वावलंबी चिकित्सा परिसर था, जो लगभग 47 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ था।
यानी आज जिस स्थान पर आधुनिक चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का इतना बड़ा केंद्र खड़ा है, वहां कभी एक समाजसेवी की सोच और सेवा भावना से टी.बी. सैनिटोरियम की नींव पड़ी थी।
बाद में हिमाचल प्रदेश सरकार ने उत्तरी हिमाचल में मेडिकल कॉलेज स्थापित करने के लिए टांडा को चुना। मेडिकल कॉलेज की आधारशिला 23 अक्टूबर 1996 को तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने रखी और 1999 में यहां एमबीबीएस की पहली बैच शुरू हुई।
मेडिकल कॉलेज का विकास होना स्वागतयोग्य है, लेकिन विकास का अर्थ इतिहास को मिटा देना नहीं हो सकता।
आज टांडा में चिकित्सा की आधुनिक सुविधाएं हैं, हजारों विद्यार्थी यहां पढ़ते हैं और असंख्य मरीज उपचार प्राप्त करते हैं। यह निश्चित रूप से गर्व की बात है। लेकिन इस उपलब्धि के साथ उस व्यक्ति का स्मरण भी होना चाहिए, जिसने उस स्थान पर चिकित्सा सेवा की कल्पना उस समय की थी जब ऐसी सोच भी असाधारण थी।
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डिस्क्लेमर: *यह लेख उपलब्ध ऐतिहासिक अभिलेखों, संस्थागत वेबसाइटों, प्रकाशित दस्तावेजों तथा उपलब्ध अन्य स्रोतों में दी गई जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है। विभिन्न स्रोतों में विवरण अथवा तथ्यों की प्रस्तुति में मामूली अंतर संभव है। लेख का उद्देश्य राय बहादुर जोधा मल कुठियाला जी के जीवन, योगदान और सामाजिक विरासत को संक्षेप में प्रस्तुत करना है।*



