#Yamunanagar *यमुनानगर: किराये के मकान में बसाया ममता का घर, डॉ. मीनू बनीं बेसहारा बुजुर्गों का सहारा*


#Yamunanagar *यमुनानगर: किराये के मकान में बसाया ममता का घर, डॉ. मीनू बनीं बेसहारा बुजुर्गों का सहारा*

किराये का मकान, पर सहारे का अपना घर
जब संवेदनाएं बनती हैं व्यवस्था, और सेवा बन जाती है जीवन का उद्देश्य!
विजय सूद एडिटर यमुनानगर (ट्राई-सिटी टाइम्स) –
आज के समय में, जब परिवारों का दायरा सिमटता जा रहा है और रिश्तों की गर्माहट कई बार परिस्थितियों के आगे कमजोर पड़ जाती है, वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अपने जीवन को दूसरों के सहारे के रूप में ढाल देते हैं। हरियाणा के यमुनानगर की समाजसेवी डॉ. मीनू चसवाल इसी मानवीय संवेदना की जीवंत मिसाल हैं।
किराये के घर से शुरू हुई मानवता की सेवा
वर्ष 2018 में, एक साधारण किराये के मकान से शुरू हुआ उनका यह प्रयास आज 15 बेसहारा बुजुर्गों का आश्रय बन चुका है। शिवपुरी कॉलोनी में स्थापित यह वृद्धाश्रम केवल रहने की जगह नहीं, बल्कि एक ऐसा “घर” है, जहां हर बुजुर्ग को सम्मान, अपनापन और सुरक्षा मिलती है।
यहां रहने वाले बुजुर्गों की हर आवश्यकता—भोजन, कपड़े, दवाइयां, स्नान और देखभाल—का ध्यान स्वयं डॉ. मीनू चसवाल रखती हैं। यह सेवा किसी औपचारिक जिम्मेदारी का निर्वहन नहीं, बल्कि एक आत्मीय रिश्ते की तरह निभाई जाती है।
जहां जीवन ‘जीया’ जाता है, केवल ‘काटा’ नहीं
इस आश्रम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां बुजुर्ग केवल समय नहीं बिताते, बल्कि जीवन को फिर से जीते हैं। जन्मदिन जैसे अवसरों को सामूहिक उत्सव के रूप में मनाया जाता है, जिससे हर व्यक्ति को परिवार का हिस्सा होने का एहसास होता है।
यह पहल एक गहरा संदेश देती है—जीवन की संध्या भी उतनी ही उजली हो सकती है, जितनी उसकी सुबह, यदि साथ में स्नेह और सम्मान हो।
सिर्फ सेवा नहीं, रिश्तों का पुनर्निर्माण
डॉ. मीनू चसवाल का कार्य केवल आश्रय देने तक सीमित नहीं है। उन्होंने अब तक लगभग 15 बुजुर्गों को उनके परिवारों से पुनः जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
यह कार्य किसी भी सामाजिक सेवा से कहीं अधिक कठिन है, क्योंकि इसमें टूटे हुए विश्वास, अहंकार और परिस्थितियों के बीच संवाद स्थापित करना पड़ता है। उनके प्रयासों से कई बुजुर्ग फिर से अपने घरों में लौटे हैं—सम्मान और अपनत्व के साथ।
शिक्षा और संवेदनशीलता का संगम
डॉ. मीनू चसवाल ने मास्टर ऑफ सोशल वर्क (MSW) के बाद इसी विषय में पीएचडी की है। उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि और सामाजिक अनुभव इस कार्य को और अधिक प्रभावी बनाते हैं।
1998 में, बीए की पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने सामाजिक सेवा की दिशा में कदम बढ़ाया था। अलग-अलग क्षेत्रों में काम करते हुए जब उन्होंने उपेक्षित और अकेले बुजुर्गों की पीड़ा को करीब से देखा, तभी उनके मन में एक स्थायी समाधान का विचार जन्मा—जो 2018 में वृद्धाश्रम के रूप में साकार हुआ।
परिवार का साथ, सेवा की ताकत
इस सेवा कार्य में उनके परिवार का भी महत्वपूर्ण योगदान है। उनकी माता सुदेश, भाई रोहित, भाभी रिचा शर्मा और बहन ममता सभी इस मिशन में सहयोग करते हैं। यह सामूहिक प्रयास ही इस आश्रम को “संस्था” से आगे बढ़ाकर “परिवार” का रूप देता है।
संपादकीय टिप्पणी
विजय सूद, एडिटर – ट्राई-सिटी टाइम्स
यमुनानगर की यह कहानी केवल एक महिला की नहीं, बल्कि उस मानवीय सोच की है, जो आज के समाज में सबसे अधिक आवश्यक है।
डॉ. मीनू चसवाल ने यह सिद्ध किया है कि सामाजिक परिवर्तन के लिए बड़े संसाधनों की नहीं, बल्कि बड़े हृदय की आवश्यकता होती है। किराये के एक साधारण मकान को उन्होंने जिस प्रकार बेसहारा बुजुर्गों के “अपने घर” में बदल दिया, वह समाज के लिए एक प्रेरणास्रोत है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि ऐसे प्रयासों को केवल सराहा ही न जाए, बल्कि उन्हें संस्थागत समर्थन भी मिले। सरकार और समाज दोनों को मिलकर इस दिशा में काम करना होगा, ताकि कोई भी बुजुर्ग अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर अकेला न महसूस करे।
डॉ. मीनू का यह प्रयास एक मॉडल है—जिसे अपनाकर हम एक अधिक संवेदनशील और समावेशी समाज की रचना कर सकते हैं।
— ट्राई सिटी टाइम्स
विजय सूद सोलन यमुनानगर



