

संपादकीय
“जनता के सुल्तान” कृष्ण दत्त सुल्तानपुरी: पंचायत के सरपंच से छह बार सांसद तक का अतुलनीय सफर
बीके सूद
चीफ एडिटर, ट्राई सिटी टाइम्स

हिमाचल प्रदेश की राजनीति के ऐसे महानायक का स्मरण करते हुए आज मेरा हृदय भारी है, जिन्होंने अपनी अथक सेवाओं, सरलता और जनता के प्रति समर्पण से शिमला लोकसभा क्षेत्र को उन्नीस वर्षों तक निरंतर प्रतिनिधित्व दिया— जी हां बात कर रही है कृष्ण दत्त सुल्तानपुरी जी की, जिन्हें जनता के बीच ‘के डी सुल्तानपुरी’ और ‘जनता के सुल्तान’ के नाम से जाना जाता था।
भारत की राजनीति में ऐसे कम ही उदाहरण होंगे कि कोई व्यक्ति पंचायत का पंच बनने से राजनीतिक यात्रा आरंभ कर छह बार संसद का सदस्य रहा हो।
कृष्ण दत्त सुल्तानपुरी का जन्म 20 अप्रैल 1932 को सोलन जिले, हिमाचल प्रदेश में हुआ था। वे हिमाचल प्रदेश के छोटे से गांव सुल्तानपुर से संबंधित थे और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य थे।
सरपंच से सांसद बनने की यात्रा में उनके पड़ाव खंड विकास समिति और जिला परिषद भी रहे। पंचायत से प्रारंभ राजनीतिक यात्रा कसौली विधानसभा क्षेत्र की एक पंचायत बड़ोग है। वहां से के डी सुल्तानपुरी जी ने पंच के रूप में राजनीतिक यात्रा आरंभ की। बाद में बड़ोग पंचायत के प्रधान भी हुए। यह वही बड़ोग है जो इंजीनियर बड़ोग के नाम से बसाया गया है, जहां कालका-शिमला रेलमार्ग की सबसे लंबी सुरंग है।
सुल्तानपुरी तब प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े थे। गांव-गांव तक प्रत्येक व्यक्ति से उनका गहरा संबंध था। समाज सेवा और क्षेत्र के विकास का भाव इतना था कि सहकारी सभाओं की स्थापना भी की। क्षेत्र के दो बड़े बैंक बघाट बैंक और जोगिंद्रा बैंक की नींव में सुल्तानपुरी के ही प्रयास थे।
1967 में लोगों ने कहा, क्षेत्र की आवाज उठाने के लिए विधानसभा जाना चाहिए। तब सोलन जिला नहीं था, बृहत्तर सोलन था, जिसके विधानसभा क्षेत्र कंडाघाट आदि थे। शेर का चुनाव चिन्ह लेकर केडी सुल्तानपुरी ने चुनाव लड़ा और हार गए। हारे तो सही, लेकिन तत्कालीन जिलाधीश सुल्तानपुरी के घर आए और कहा, “मैं क्षमायाचना करने आया हूं। आप हारे नहीं हैं, आपको हराया गया है। आपके साथ कुछ गलत हुआ है।” क्या गलत हुआ था, यह आज तक रहस्य है।
उन्होंने 1972 में दोबारा विधानसभा चुनाव लड़ा और जीते। तब तक वह हिमाचल निर्माता डा. यशवंत सिंह परमार के करीब आ गए थे।
परमार जी ने पूछा, “मंत्री बनोगे?” सुल्तानपुरी बोले, “पद का क्या करना है, आप मेरे क्षेत्र के काम कर दिया करें।” 1977 में जनता पार्टी की लहर आई और सुल्तानपुरी 143 मतों से चमन लाल गाचली से हार गए।
1980 में जब इंदिरा गांधी ने वापसी की तो के डी सुल्तानपुरी पहली बार सांसद बने। वे 1980 से 1998 तक लगातार छह बार शिमला लोकसभा सीट से सांसद चुने गए। यह रिकॉर्ड आज तक किसी भी अन्य उम्मीदवार के पास नहीं है। यह नाम 1980 से लेकर 1998 के चुनाव तक गूंजता रहा, निर्बाध और अविरल।
विनोद सुल्तानपुरी, जो आज कसौली से विधायक हैं और केडी सुल्तानपुरी के छोटे पुत्र हैं, आज भी याद करते हैं, “मुझे अजीब लगता था जब लोग पिता जी को एमपी कहते थे। सोचता था कि जो आता है, वह एमपी को ढूंढता है, हमारे पिता जी का नाम एमपी तो नहीं है। लोगों ने किससे पूछकर पिता जी का नाम बदल दिया होगा… और यह सब पांच या 10 वर्ष तक नहीं हुआ, यह नाम 1980 से लेकर 1998 के चुनाव तक गूंजता रहा, निर्बाध… अविरल।”
केडी सुल्तानपुरी की विशेषता तीन बातें थीं। पहली, मीठी बोली और कड़क काम। वे पहाड़ी बोली में ही बात करते थे। दूसरी, आगंतुकों के लिए हमेशा उपलब्ध। घर आने वाला कोई भी व्यक्ति बिना चाय-पानी के नहीं जाता था। तीसरी, क्षेत्र के छोटे मुद्दों से लेकर बड़े विषयों तक उनकी गहरी पकड़ थी। उनकी बोली में बघाटी और सिरमौरी महक आती थी, लेकिन संसद में या बाहर के नेताओं के साथ वे हिंदी में बात करते थे।
उनकी प्रमुख उपलब्धियों में सोलन को जिला घोषित करवाना और सोलन को ही जिला मुख्यालय बनवाना शामिल है, जबकि उस समय का सोलन बहुत कम विकसित था। डा. यशवंत सिंह परमार वानिकी एवं बागवानी विश्वविद्यालय भी उन्हीं की देन है। इसे पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने स्वीकृति दी तथा लोकार्पण तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने किया था। इसके अलावा स्टोन फ्रूट के लिए बागवानों को समस्या न आए, तो उन्होंने उस जमाने में मल्ला से सुल्तानपुर, छैला, रोहड़ू और चौपाल तक हर मौसम में खुला रहने वाला मार्ग बनवाया था।
संसदीय क्षेत्र के तीन जिलों—शिमला, सोलन और सिरमौर—के कई गांवों के लिए 1985 में टेलीफोन एक्सचेंज स्थापित करने से लेकर बागवानी विश्वविद्यालय की मांग करने तक उनके प्रयास रहे हैं। जब राम निवास मिर्धा संचार मंत्री थे, केडी सुल्तानपुरी के संसद में पूछे गए प्रश्नों में उनका शिमला संसदीय क्षेत्र ही झलकता था।
केडी सुल्तानपुरी की आम पृष्ठभूमि सबको मोह लेती थी। उनका अपना कोई एजेंडा नहीं था सिवाय क्षेत्र के विकास के।
डॉ. यशवंत सिंह परमार, ठाकुर राम लाल और वीरभद्र सिंह से उनके अच्छे संबंध रहे। अंतिम पारी में वीरभद्र सिंह के साथ अवश्य मतभेद हुए और सातवीं बार उन्हें टिकट नहीं दिया गया। मगर मतभेद दूर हुए तो एक दिन वीरभद्र सिंह ने कहा, “यार केडी, जय बिहारी लाल खाची चले गए, राम लाल ठाकुर चले गए… एक दिन मैं और आप भी चले जाएंगे… हम स्वर्ग में मंत्रिमंडल का गठन करेंगे।”
सुल्तानपुरी साधारण कुर्ता-पायजामा पहनते थे। सपुत्र विनोद बताते हैं, “घर आते तो देखते थे कि कभी सब्जी नहीं है तो बस सिल पर नमक घिसने के बाद रोटी पर छिड़का और छाछ के साथ खाकर जनसभा के लिए निकल जाते थे। वे जानते थे कि मां ने पूरी खेती संभाली है। पिता जी जितने वर्ष सांसद रहे, उतने वर्ष भी मां ने टमाटर की खेती नहीं छोड़ी। यह क्षेत्र टमाटर के लिए प्रसिद्ध है। हमने पिता जी से स्कूल की फीस या अन्य कामों के लिए कभी पैसा नहीं मांगा। यह सब हिसाब मां के साथ होता था। पिता जी बाहर का काम अधिक देखते थे।”
एक पुत्र का स्मरण:
बाल कृष्ण सूद, बड़ोग गांव के निवासी
इस लेख में एक personal स्मरण भी जोड़ना चाहता हूं। मैं बालकृष्ण सूद, बड़ोग गांव से संबंधित हूं। हमारे परिवार के सुल्तानपुरी जी की परिवार से पारिवारिक रिश्ते थे। मेरे पिताजी उनकी सरपंची में उनके साथ पंच भी रहे थे। मेरे पिताजी व्यापार करते थे, तो सुल्तानपुरी जी कृषि—दोनों का आपस में बहुत मेलजोल था। हर त्यौहार पर और हर समारोह पर एक दूसरे के घर आया-जाया करते थे।
जब मैं छोटा बच्चा था, दसवीं पास करके आईटीआई सोलन में एडमिशन के लिए गया, तो वह इंटरव्यू लेने के लिए बैठे थे। उन्होंने मुझे पहचान लिया और पूछा कि कौन से ट्रेड में एडमिशन लेनी है। मैंने कहा कि मुझे स्टेनो की ट्रेड में एडमिशन करवानी है। उन्होंने मुझसे बिना पूछे ही मेरी एडमिशन ड्राफ्ट्समैन सिविल ट्रेड में करवा दी, क्योंकि उन दिनों यह ट्रेड बहुत डिमांड में था और ट्रेनिंग करते ही नौकरी मिल जाती थी।
शाम को वह इंटरव्यू करके बड़ोग पहुंचे तो अपनी जीप रोककर उन्होंने पिताजी को बुलवाया कि मुझसे बात करो। मोबाइल तो होते नहीं थे, हमारे घर में टेलीफोन भी नहीं था। पिताजी घर पर नहीं थे, इसलिए मुझे ही उनके पास जाना पड़ा। और उन्होंने जीप में बैठे-बैठे ही मुझे बता दिया कि “मैंने तेरी एडमिशन ड्राफ्ट्समैन सिविल इंजीनियरिंग के कोर्स में करवा दी है। अब तू स्टेनोग्राफी करके बाबू नहीं बनेगा। लेकिन अच्छी नौकरी तुझे मिल जाएगी।”
तो इस तरह के हितैषी थे हमारे सुल्तानपुरी जी। अपने गांव वासियों के लिए, अपने वोटर्स के लिए, अपने दोस्तों के लिए, अपने दोस्तों के परिवार के लिए।
10 जून 2006 को धर्मपुर क्षेत्र में एक भारी हृदयाघात के बाद कृष्ण दत्त सुल्तानपुरी का निधन हो गया, जब वे 74 वर्ष के थे। वे पार्टी कर्मचारी के घर जा रहे थे जब उन्हें दिल का दौरा पड़ा। 12 जून 2006 को सुल्तानपुर गांव, सोलन जिले में उनका अंतिम संस्कार किया गया। बड़े पुत्र कमल ने अग्नि दी। चीफ मिनिस्टर वीरभद्र सिंह, HPCC President विप्लव ठाकुर, Power Minister विद्या स्टोक्स, Revenue Minister सत्य मधजन, Irrigation Minister कौल सिंह ठाकुर, Forest Minister राम लाल ठाकुर सहित सैकड़ों लोगों ने अंतिम दर्शन किए।
CM वीरभद्र सिंह ने उनके पार्टी को मजबूत करने और समाज के कमजोर वर्गों के उत्थान में योगदान को याद किया। शान्ता कुमार, प्रेम कुमार धूमल और सुरेश भारद्वाज जैसे नेताओं ने भी श्रद्धांजलि दी।
आज जब मैं कृष्ण दत्त सुल्तानपुरी की याद में लेख लिख रहा हूँ ” हमें यह समझना चाहिए कि उनका जीवन आधुनिक राजनीति के लिए एक प्रेरणा स्रोत है। पंच से सांसद तक का यह सफर आज की पीढ़ी के लिए एक प्रेरणा स्रोत है। उनकी सादगी, ईमानदारी और जनता के प्रति समर्पण आज के राजनेताओं के लिए एक मिसाल है”।
आज जब मैं कृष्ण दत्त सुल्तानपुरी की याद में यह लेख लिख रहा हूं, तो मुझे गहराई से अहसास होता है कि उनका जीवन आधुनिक राजनीति के लिए एक प्रेरणा स्रोत है। पंच से सांसद तक का यह सफर आज की पीढ़ी के लिए एक मिसाल है। उनकी सादगी, ईमानदारी और जनता के प्रति निस्वार्थ समर्पण आज के राजनेताओं के लिए एक आदर्श है। आज के राजनीतिक माहौल में जहां स्वार्थ और व्यक्तिगत लाभ प्रमुख है, वहां केडी सुल्तानपुरी का जीवन हमें याद दिलाता है कि राजनीति सेवा का नाम है, सत्ता का नहीं।
“जनता के सुल्तान” कृष्ण दत्त सुल्तानपुरी को मेरी विनम्र और गहरी श्रद्धांजलि।
बीके सूद बड़ोग
चीफ एडिटर, ट्राई सिटी टाइम्स
पालमपुर मोहाली, 



