#PGI:*पीजीआई चंडीगढ़ की भीड़: वोट बैंक की राजनीति और दम तोड़ती स्वास्थ्य व्यवस्था*


पीजीआई चंडीगढ़ की भीड़: वोट बैंक की राजनीति और दम तोड़ती स्वास्थ्य व्यवस्था

ट्राई सिटी टाइम्स | संपादकीय
भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में राजनीति का मूल उद्देश्य जनता का कल्याण और व्यवस्था का विकास होना चाहिए, लेकिन आज की वास्तविकता यह है कि देश की राजनीति का बड़ा हिस्सा वोट बैंक की राजनीति तक सीमित होकर रह गया है। चुनाव आते ही वादों की झड़ी लग जाती है, योजनाओं की घोषणाएं होती हैं और जनता को लुभाने के लिए मुफ्त सुविधाओं का जाल बिछा दिया जाता है। सत्ता हासिल करना ही अंतिम लक्ष्य बन जाता है, भले ही उसके बाद जनता की बुनियादी जरूरतों की स्थिति में कोई ठोस बदलाव क्यों न आए।
स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, बिजली और पानी किसी भी नागरिक के मूल अधिकार हैं। लेकिन दुर्भाग्य से चुनावी राजनीति में इन बुनियादी मुद्दों की चर्चा अक्सर हाशिये पर चली जाती है। भारत में आज भी करोड़ों लोग ऐसे हैं जो केवल इसलिए इलाज नहीं करवा पाते क्योंकि उनके पास पर्याप्त आर्थिक संसाधन नहीं होते। कई परिवार गंभीर बीमारी की स्थिति में अपनी जमा पूंजी तक खर्च कर देते हैं, जबकि कई लोग इलाज के अभाव में समय से पहले ही दम तोड़ देते हैं।
इस सच्चाई की एक झलक देश के प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान
Postgraduate Institute of Medical Education and Research
पीजीआई चंडीगढ़ में साफ दिखाई देती है। यह केवल एक अस्पताल नहीं बल्कि उत्तर भारत के करोड़ों लोगों के लिए उम्मीद का सबसे बड़ा केंद्र है। पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड जैसे राज्यों से मरीज यहां बड़ी उम्मीद लेकर पहुंचते हैं। खासकर वे लोग जिनके पास निजी अस्पतालों में महंगा इलाज करवाने की क्षमता नहीं होती, उनके लिए पीजीआई आखिरी सहारा बन जाता है।
लेकिन जब कोई व्यक्ति यहां पहुंचता है तो उसे सबसे पहले जिस सच्चाई से सामना होता है, वह है मरीजों की भारी भीड़। अस्पताल के गलियारों, ओपीडी और वार्डों में मरीजों और उनके तीमारदारों की लंबी कतारें दिखाई देती हैं। कई बार मरीजों को घंटों नहीं बल्कि कई दिनों तक इंतजार करना पड़ता है।
यह स्थिति केवल इसलिए नहीं है कि लोग यहां इलाज के लिए आते हैं, बल्कि इसलिए भी है कि देश की स्वास्थ्य व्यवस्था में पर्याप्त अस्पताल, डॉक्टर और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध नहीं हैं। पीजीआई जैसे बड़े संस्थानों पर इतना अधिक दबाव है कि पूरा सिस्टम लगातार बोझ के नीचे दबा हुआ महसूस होता है।
इस परिस्थिति में डॉक्टर और अस्पताल का स्टाफ भी कम परेशान नहीं है। सीमित संसाधनों और अत्यधिक मरीजों के दबाव के बीच उन्हें लगातार काम करना पड़ता है। एक डॉक्टर को जितने मरीज देखने पड़ते हैं, वह किसी भी आदर्श स्वास्थ्य व्यवस्था की तुलना में कई गुना अधिक होता है। ऐसे में चाहकर भी हर मरीज को पर्याप्त समय और ध्यान देना संभव नहीं हो पाता।
सबसे अधिक कठिन स्थिति मरीजों और उनके तीमारदारों की होती है। दूर-दराज के गांवों और कस्बों से लोग उम्मीद लेकर आते हैं, अस्पताल के बाहर या गलियारों में रात गुजारते हैं और केवल इस आशा में इंतजार करते हैं कि उन्हें समय पर इलाज मिल जाएगा।
यहां सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर ऐसी स्थिति पैदा क्यों होती है। इसका उत्तर कहीं न कहीं हमारी राजनीतिक प्राथमिकताओं में छिपा हुआ है। सरकारें अक्सर उन योजनाओं पर अधिक जोर देती हैं जो तुरंत राजनीतिक लाभ दे सकें। मुफ्त राशन, मुफ्त बिजली और अन्य प्रकार की सब्सिडी योजनाएं चुनावी राजनीति का अहम हिस्सा बन जाती हैं। इन योजनाओं का सामाजिक महत्व हो सकता है, लेकिन यदि इन्हीं संसाधनों का बड़ा हिस्सा स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने में लगाया जाए तो उसका लाभ कहीं अधिक व्यापक और स्थायी हो सकता है। 

यदि जिला स्तर पर आधुनिक अस्पताल बनाए जाएं, डॉक्टरों और नर्सों की संख्या बढ़ाई जाए, मेडिकल कॉलेजों का विस्तार किया जाए और सरकारी अस्पतालों को आधुनिक मशीनों से लैस किया जाए, तो पीजीआई जैसे बड़े संस्थानों पर पड़ने वाला अत्यधिक दबाव काफी हद तक कम हो सकता है।
दुनिया के कई विकसित देशों में स्वास्थ्य व्यवस्था मजबूत इसलिए है क्योंकि वहां इसे प्राथमिकता दी जाती है। वहां की सरकारें यह समझती हैं कि एक स्वस्थ समाज ही किसी भी देश की असली ताकत होता है। भारत में भी यह संभव है, लेकिन इसके लिए राजनीति को वोट बैंक से आगे बढ़कर व्यवस्था सुधार की दिशा में गंभीरता से कदम उठाने होंगे।
पीजीआई चंडीगढ़ में दिखाई देने वाली भीड़ केवल एक अस्पताल की समस्या नहीं है। यह देश की स्वास्थ्य व्यवस्था और राजनीतिक प्राथमिकताओं का आईना है।
जब तक सरकारें मुफ्त योजनाओं की राजनीति से ऊपर उठकर स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने के लिए ठोस और ईमानदार प्रयास नहीं करेंगी, तब तक अस्पतालों की भीड़ कम नहीं होगी और आम आदमी के लिए इलाज की उम्मीद एक कठिन संघर्ष बनी रहेगी।
देश को केवल घोषणाओं की नहीं, बल्कि ऐसी नीतियों की जरूरत है जो अस्पतालों में भीड़ नहीं बल्कि व्यवस्था पैदा करें — क्योंकि एक मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था ही किसी भी सभ्य समाज की असली पहचान होती है।




