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*टांडा से डॉ. मुकुल भटनागर का तबादला: आखिर मरीजों की पीड़ा बढ़ाने वाला फैसला क्यों?*

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टांडा से डॉ. मुकुल भटनागर का तबादला: आखिर मरीजों की पीड़ा बढ़ाने वाला फैसला क्यों?

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ट्राई सिटी टाइम्स विशेष रिपोर्ट
टांडा मेडिकल कॉलेज के वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. मुकुल भटनागर के तबादले की खबर सामने आने के बाद प्रदेश भर, विशेषकर कांगड़ा, चंबा, हमीरपुर और मंडी क्षेत्र के मरीजों तथा उनके परिजनों में गहरी नाराजगी देखने को मिल रही है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों, स्थानीय चर्चाओं और विभिन्न समाचार पोर्टलों पर लोग लगातार यह सवाल उठा रहे हैं कि जब प्रदेश में पहले ही विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी की चर्चा होती रहती है तो ऐसे डॉक्टर, जिन पर हजारों मरीज भरोसा करते हैं, उन्हें मरीजों से दूर क्यों किया जा रहा है?
पूर्व विधायक प्रवीण शर्मा ने उठाए सवाल
पूर्व विधायक प्रवीण कुमार शर्मा ने इस विषय पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि “जो तन लागे सो तन जाने, और न जाने पीर पराई।” उन्होंने कहा कि डॉ. मुकुल भटनागर केवल एक योग्य चिकित्सक ही नहीं बल्कि संवेदनशील इंसान भी हैं।
प्रवीण शर्मा ने अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए कहा कि उनके दो भाइयों को गंभीर हृदयाघात के दौरान डॉ. भटनागर ने त्वरित उपचार देकर जीवनदान दिया था। उन्होंने बताया कि उन्होंने स्वयं देखा है कि सुबह तड़के से ही दूर-दराज़ क्षेत्रों से आने वाले मरीजों की लंबी कतारें लग जाती थीं और डॉ. भटनागर देर शाम तक सभी मरीजों को देखने के बाद ही अस्पताल से निकलते थे।
उन्होंने मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू और स्वास्थ्य मंत्री धनी राम शांडिल से आग्रह किया कि यदि किसी प्रकार की प्रशासनिक या व्यक्तिगत शिकायत थी तो उसका समाधान तबादला नहीं होना चाहिए था। उन्होंने यह भी कहा कि जनता के बीच ऐसी चर्चाएं हैं कि कहीं इस निर्णय से निजी अस्पतालों को अप्रत्यक्ष लाभ तो नहीं पहुंच रहा।
मरीजों का दर्द: “डॉक्टर नहीं, विश्वास का तबादला हुआ है”
एक हृदय रोगी ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि:
“डॉ. मुकुल भटनागर ऐसे चिकित्सक थे जिन पर लोग आंखें बंद करके भरोसा कर लेते थे। केवल नए डॉक्टर नियुक्त कर देना समाधान नहीं है। यह भी देखना चाहिए था कि डॉ. मुकुल के साथ हजारों मरीजों का विश्वास जुड़ा हुआ था।”
कई मरीजों का कहना है कि डॉक्टरों की नियुक्ति स्वागतयोग्य है, लेकिन वर्षों से बनी विशेषज्ञता, अनुभव और मरीजों का भरोसा एक प्रशासनिक आदेश से तुरंत स्थानांतरित नहीं किया जा सकता।
सोशल मीडिया और न्यूज़ पोर्टलों पर भी बहस
स्थानीय सोशल मीडिया समूहों और ब्लैक एंड व्हाइट ब्रॉडकास्टर जैसे क्षेत्रीय न्यूज़ प्लेटफॉर्मों पर भी इस फैसले को लेकर व्यापक चर्चा चल रही है। अनेक लोगों का मानना है कि स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े निर्णय लेते समय मरीजों की सुविधा और जनभावनाओं को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। कई टिप्पणियों में यह सवाल भी उठाया गया है कि यदि किसी डॉक्टर की ओपीडी पर इतना अधिक भरोसा और भीड़ है तो उसे स्वास्थ्य व्यवस्था की ताकत माना जाना चाहिए, समस्या नहीं।
जनता पूछ रही है…
क्या सरकार इस निर्णय के पीछे के कारणों को सार्वजनिक करेगी?
क्या मरीजों और उनके परिवारों की चिंताओं को सुना जाएगा?
क्या ऐसे विशेषज्ञ चिकित्सकों को प्रशासनिक दायित्वों में भेजने से पहले मरीजों पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन किया गया?
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि यह केवल एक तबादले का मामला नहीं रह गया है। बड़ी संख्या में लोगों के लिए यह उस भरोसे, सुरक्षा और उम्मीद का प्रश्न बन गया है जो वे अपने चिकित्सक में देखते हैं।
जनता का संदेश साफ है— स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े निर्णयों में मरीजों की आवाज़ भी सुनी जानी चाहिए।
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