#Editorial :*हिमाचल की पत्रकारिता: अनुभव, वर्चस्व और नई पीढ़ी के सामने खड़ी चुनौतियाँ*!


ट्राइ-सिटी टाइम्स (Tri-City Times) — संपादकीय

हिमाचल की पत्रकारिता: अनुभव, वर्चस्व और नई पीढ़ी के सामने खड़ी चुनौतियाँ!
हिमाचल प्रदेश की पत्रकारिता का इतिहास बेहद समृद्ध, गौरवशाली और संघर्षपूर्ण रहा है। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों, सीमित संसाधनों और बुनियादी सुविधाओं के अभाव के बावजूद यहाँ के पत्रकारों ने हमेशा जनसरोकारों को प्राथमिकता दी है। दशकों तक अनेक वरिष्ठ पत्रकारों ने निष्पक्ष, निर्भीक और मूल्य-आधारित पत्रकारिता के ज़रिए जनता का अटूट विश्वास हासिल किया। उन्होंने सत्ता के गलियारों से असहज करने वाले सवाल पूछे, जनहित को सर्वोपरि रखा और पत्रकारिता को एक पवित्र मिशन की तरह जिया। उनका यह अमूल्य योगदान सदैव स्मरणीय और वंदनीय रहेगा।
लेकिन समय के साथ मीडिया का स्वरूप बदला है। तकनीक में आए क्रांतिकारी बदलावों, सूचना के बदलते माध्यमों और पाठकों व दर्शकों की नई अपेक्षाओं ने पूरे परिदृश्य को डिजिटल रंग में रंग दिया है। इस बड़े बदलाव के बीच कुछ ऐसी प्रवृत्तियाँ भी पनपी हैं, जिन पर गंभीर आत्ममंथन आवश्यक है।
यदि भविष्य में हिमाचल की पत्रकारिता पर कोई निष्पक्ष अध्ययन हो, तो वह केवल प्रकाशित समाचारों या मीडिया संस्थानों तक सीमित नहीं रह सकता। उसे यह भी देखना होगा कि कैसे कुछ चुनिंदा चेहरे दशकों तक प्रेस क्लबों, सरकारी समितियों और मुख्य मंचों पर अपना वर्चस्व बनाए रहे। अनुभव और वरिष्ठता का सम्मान होना ही चाहिए, लेकिन जब अवसरों का दायरा सिमटने लगे और नए विचारों व युवा प्रतिभाओं के लिए राह कठिन होने लगे, तो व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
आज कई बार पत्रकारिता की गुणवत्ता का आंकलन खबर की गहराई या जनहित के बजाय इस बात से होने लगता है कि किसकी किस अधिकारी या नेता से कितनी निकटता है। जब जनसरोकार पीछे छूट जाएँ और व्यक्तिगत प्रभाव व समीकरण हावी होने लगें, तो पत्रकारिता की मूल आत्मा आहत होती है। पत्रकारिता की असली ताकत सत्ता के गलियारों में पहचान नहीं, बल्कि जनता का विश्वास और निष्पक्ष रिपोर्टिंग है।
इसका सबसे बड़ा नुकसान नई पीढ़ी को उठाना पड़ रहा है। आज के युवा पत्रकार आधुनिक तकनीक, डिजिटल दक्षता और खोजी पत्रकारिता की नई दृष्टि के साथ आ रहे हैं। उनके पास ऊर्जा और नए विचार हैं, लेकिन कई बार उन्हें अवसरों की कमी और स्थापित समूहों के पूर्वाग्रहों का सामना करना पड़ता है। कुछ मामलों में उन्हें सहयोग देने के बजाय प्रतिस्पर्धा या नकारात्मक माहौल का सामना करना पड़ता है, जो पूरी पत्रकारिता बिरादरी के लिए नुकसानदेह है।
हालाँकि, यह भी उतना ही सच है कि हिमाचल के अनेक वरिष्ठ पत्रकारों ने नई पीढ़ी का मार्गदर्शन कर स्वस्थ परंपराओं को जीवित रखा है। उन्हीं के प्रयासों से पत्रकारिता का भरोसा आज भी बना हुआ है। इसलिए कुछ व्यक्तियों के आचरण के आधार पर पूरे वरिष्ठ वर्ग को कटघरे में खड़ा करना अनुचित होगा।
डिजिटल क्रांति और जागरूक पाठकों के इस दौर में अब केवल पुराना नेटवर्क या प्रभाव काम नहीं आ सकता। सफलता का आधार केवल तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गुणवत्ता, निष्पक्षता और निरंतर सीखना ही रहेगा। वरिष्ठों को चाहिए कि वे युवाओं के संरक्षक और ‘मेंटर’ बनें, न कि उन्हें अपना प्रतिद्वंद्वी समझें।
ट्राइ-सिटी टाइम्स का स्पष्ट मानना है कि पद, समितियाँ और व्यक्तिगत नेटवर्क क्षणभंगुर हैं। जो स्थायी है, वह है ईमानदारी, प्रामाणिकता और जनता का भरोसा। जब पत्रकार एक-दूसरे के पूरक बनकर निष्पक्षता का मार्ग चुनेंगे, तभी लोकतंत्र का यह चौथा स्तंभ और अधिक सशक्त हो सकेगा।
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