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#Kangna:सवाल कंगना की भाषा का नहीं, उस सिस्टम का है जिसमें आम आदमी की सुनवाई नहीं होती

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संपादकीय

सवाल कंगना की भाषा का नहीं, उस सिस्टम का है जिसमें आम आदमी की सुनवाई नहीं होती

कंगना रनौत का मंडी की दिशा बैठक में अधिकारियों को फटकारना और कठोर भाषा का इस्तेमाल करना इन दिनों चर्चा का विषय है। करीब 11 करोड़ रुपये की सांसद निधि के अपेक्षित उपयोग और विकास कार्यों की धीमी प्रगति को लेकर उन्होंने अधिकारियों से जवाब मांगा और अपनी नाराजगी खुलकर जाहिर की। मीडिया में बैठक के दौरान उनके तीखे तेवर और अधिकारियों के प्रति इस्तेमाल किए गए कुछ कठोर शब्द भी सामने आए हैं।

निश्चित रूप से किसी भी जनप्रतिनिधि के लिए अधिकारियों या कर्मचारियों के साथ बातचीत में मर्यादा बनाए रखना जरूरी है। पद बड़ा हो या छोटा, लोकतंत्र में भाषा की गरिमा समाप्त नहीं होनी चाहिए। अधिकारी भी उसी व्यवस्था का हिस्सा हैं जिसकी जवाबदेही जनता के प्रति है और उन्हें भी सम्मान के साथ अपना पक्ष रखने का अधिकार है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम पर केवल यह बहस करना कि कंगना ने अधिकारियों को डांटा या उनकी भाषा कठोर थी, शायद इस मामले के सबसे महत्वपूर्ण पहलू से हमें दूर ले जाएगा। असली सवाल यह है कि आखिर आम आदमी की आवाज कितनी आसानी से सरकारी व्यवस्था तक पहुंचती है?

जिस आम आदमी का कोई राजनीतिक रसूख नहीं है, जिसकी पहचान किसी बड़े नेता से नहीं है, जो पत्रकार नहीं है, जो वीआईपी नहीं है और जिसके पास किसी अधिकारी या मंत्री का फोन नंबर नहीं है, उसकी स्थिति क्या है? वह अपने किसी छोटे से काम के लिए सरकारी कार्यालय जाता है। कभी उसे एक कर्मचारी के पास भेजा जाता है, कभी दूसरे टेबल पर, कभी अधिकारी उपलब्ध नहीं होते और कभी फाइल आगे बढ़ने के लिए किसी और कागज की जरूरत बता दी जाती है। कई बार काम इतना छोटा होता है कि उसे देखकर लगता है कि यह तो कुछ घंटों या कुछ दिनों में हो जाना चाहिए, लेकिन वही काम कराने में आम आदमी के महीने निकल जाते हैं। वह कार्यालयों के चक्कर लगाता है, छुट्टी करता है, किराया खर्च करता है और अंत में उसकी चप्पल ही नहीं, उसका धैर्य भी घिस जाता है।

सबसे बड़ी विडंबना तब सामने आती है जब वही नागरिक अपनी परेशानी से परेशान होकर थोड़ी ऊंची आवाज में अपनी बात रख देता है। उसे तुरंत अनुशासन, सरकारी काम में बाधा या कानूनी कार्रवाई का डर दिखाया जा सकता है। यहां यह स्पष्ट करना भी जरूरी है कि सरकारी कर्मचारी को धमकाना, काम में वास्तविक बाधा डालना या कानून अपने हाथ में लेना किसी नागरिक का अधिकार नहीं है। लेकिन क्या अपनी समस्या का जवाब मांगना भी किसी नागरिक के लिए अपराध जैसा व्यवहार पाने का कारण बन जाना चाहिए? क्या नागरिक को अपनी बात रखने के लिए पहले किसी नेता की सिफारिश तलाशनी चाहिए?

यहीं से यह सवाल और गंभीर हो जाता है कि अगर अधिकारी आम आदमी की बात सुनने लगें, उसकी शिकायत का समय पर निपटारा करने लगें और नियमों के अनुसार उसका काम बिना किसी सिफारिश के होने लगे, तो फिर नेताओं की जरूरत किस काम के लिए रह जाएगी? निश्चित रूप से नेताओं की जरूरत लोकतंत्र में हमेशा रहेगी, क्योंकि उनका काम केवल व्यक्तिगत सिफारिशें करना नहीं बल्कि नीतियां बनाना, जनता की सामूहिक समस्याएं उठाना और सरकार तथा प्रशासन को जवाबदेह बनाना है। लेकिन आज की व्यवस्था की विडंबना यह है कि अनेक बार जनप्रतिनिधि भी ऐसे छोटे-छोटे प्रशासनिक कामों के लिए अधिकारियों को फोन करने को मजबूर दिखाई देते हैं। जनता भी परेशान है और नेता भी परेशान हैं, जबकि ऐसी स्थिति में सबसे अधिक फायदा उस व्यवस्था को होता है जो अपनी जिम्मेदारी से बच निकलती है।

सोचिए, अगर किसी नागरिक का काम नियम के अनुसार होना है तो उसे किसी नेता की सिफारिश की आवश्यकता क्यों होनी चाहिए? अगर काम नियम के अनुसार नहीं होना है तो किसी नेता की सिफारिश उसे नियम से ऊपर कैसे कर सकती है? और अगर नियम सबके लिए समान हैं तो फिर किसी पत्रकार, वीआईपी, नेता या प्रभावशाली व्यक्ति की मौजूदगी से किसी सरकारी कार्यालय में काम की गति क्यों बदलनी चाहिए?

असल बीमारी यहीं है। हमने धीरे-धीरे ऐसी व्यवस्था स्वीकार कर ली है जिसमें अधिकार और सुविधा के बीच सिफारिश एक पुल बन गई है। आम आदमी कहता है, “मेरा काम नहीं हो रहा।” कोई कहता है, “किसी नेता से फोन करवा लो।” नेता फोन करता है तो फाइल चल पड़ती है। फिर वही काम बिना फोन के क्यों नहीं हुआ, इसका जवाब कोई नहीं देता। इस व्यवस्था ने जनता और नेताओं दोनों को एक ऐसे चक्र में डाल दिया है जिसमें नेता भी हर छोटे काम के लिए सिफारिश करते-करते परेशान होते हैं और जनता भी अपनी बारी आने के लिए किसी सिफारिश का इंतजार करती रहती है।

कंगना रनौत के मामले में भी यही बात लागू होती है। सांसद का यह दायित्व है कि वह अपने क्षेत्र में विकास कार्यों की प्रगति पर सवाल करे, अधिकारियों से जवाब मांगे और जनता के पैसे के इस्तेमाल को लेकर जवाबदेही सुनिश्चित करे। अगर किसी विकास कार्य में देरी हो रही है या सांसद निधि की राशि अपेक्षित गति से खर्च नहीं हो रही, तो उस पर सवाल उठना स्वाभाविक है। लेकिन सवाल पूछने और अधिकारियों को सार्वजनिक रूप से अपमानित करने के बीच एक मर्यादा की रेखा भी होती है। मजबूत जनप्रतिनिधित्व का अर्थ यह नहीं कि अधिकारी को डराया जाए; मजबूत जनप्रतिनिधित्व का अर्थ यह है कि अधिकारी को नियम, तथ्य और जवाबदेही के आधार पर उत्तर देना पड़े।

और यही बात अधिकारियों पर भी लागू होती है। सरकारी पद किसी कर्मचारी या अधिकारी को नागरिक से मनमाना व्यवहार करने का अधिकार नहीं देता। अधिकारी की कुर्सी जनता की सेवा के लिए है, जनता पर एहसान करने के लिए नहीं। नागरिक यदि नियम के अनुसार अपना काम लेकर आया है तो उसे सम्मानपूर्वक सुना जाना चाहिए और यदि उसका काम नहीं हो सकता तो उसे स्पष्ट और लिखित कारण बताया जाना चाहिए। “काम नहीं होगा”, “बाद में आना”, “ऊपर से आदेश लाओ” या “किसी को लेकर आओ” जैसी मानसिकता लोकतांत्रिक प्रशासन की पहचान नहीं हो सकती।

हमें ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता है जिसमें किसी काम को करवाने के लिए न कंगना जैसी सांसद को गुस्सा करना पड़े, न किसी नेता को फोन करना पड़े और न आम आदमी को किसी प्रभावशाली व्यक्ति के दरवाजे पर जाना पड़े। आवेदन की समयसीमा तय हो, उसकी स्थिति नागरिक को पता हो, अनावश्यक देरी के लिए जिम्मेदारी तय हो और अधिकारी भी राजनीतिक दबाव से मुक्त होकर नियमों के अनुसार निर्णय ले सकें। तब प्रशासन मजबूत होगा और जनप्रतिनिधियों की भूमिका भी ज्यादा सार्थक होगी।

इस पूरे विवाद में सबसे खतरनाक बात यह होगी कि हम केवल कंगना की भाषा पर बहस करके उस मूल समस्या को भूल जाएं, जिसने यह सवाल पैदा किया है। कठोर भाषा निश्चित रूप से आदर्श नहीं है, लेकिन क्या हमें यह भी नहीं पूछना चाहिए कि आखिर एक निर्वाचित सांसद को अधिकारियों के सामने इतनी नाराजगी व्यक्त करने की नौबत क्यों आई? और उससे भी बड़ा सवाल यह है कि जिस आम आदमी के पास न सांसद का पद है, न कैमरा है, न मीडिया की पहुंच है, न किसी बड़े अधिकारी तक सीधी पहुंच है, वह अपनी समस्या लेकर कहां जाए?

लोकतंत्र की असली परीक्षा यह नहीं है कि कोई बड़ा नेता अधिकारी को फटकार सकता है या नहीं। असली परीक्षा यह है कि क्या एक साधारण नागरिक बिना किसी सिफारिश के अपने अधिकार का काम करवा सकता है या नहीं।

अगर जवाब हां है, तो व्यवस्था मजबूत है। अगर जवाब नहीं है, तो समस्या केवल कंगना की भाषा में नहीं, पूरे सिस्टम में है।

हमें ऐसा सिस्टम चाहिए जहां नागरिक किसी अधिकारी के सामने हाथ जोड़कर यह न कहे कि “साहब, मेरा काम कर दीजिए”, बल्कि वह आत्मविश्वास से कह सके कि “यह मेरा अधिकार है, कृपया नियम के अनुसार मेरा काम कर दीजिए।”

जिस दिन यह स्थिति आ गई, उस दिन नेताओं को छोटे-छोटे कामों की सिफारिश करने की जरूरत नहीं होगी, अधिकारियों को फटकार खाने की जरूरत नहीं होगी और आम आदमी को अपनी चप्पल घिसकर सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने की जरूरत नहीं होगी।

क्योंकि अच्छी व्यवस्था वह नहीं जिसमें नेता की आवाज सबसे ऊंची हो; अच्छी व्यवस्था वह है जिसमें आम आदमी की आवाज भी बिना ऊंची किए सुन ली जाए।

 

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