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#SDM किसी भूमि के मालिकाना हक का फैसला किए बिना भी गांव के लंबे समय से उपयोग किए जा रहे रास्ते से रुकावट हटाने का आदेश दे सकते हैं

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⚖️ हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SDM) किसी भूमि के मालिकाना हक का फैसला किए बिना भी गांव के लंबे समय से उपयोग किए जा रहे रास्ते से रुकावट हटाने का आदेश दे सकते हैं। न्यायालय ने कहा कि जब किसी रास्ते के उपयोग को लेकर विवाद से शांति भंग होने की आशंका हो और लोगों का उस रास्ते पर लंबे समय से स्थापित उपयोग का अधिकार हो, तब CrPC की धारा 147 के तहत एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट हस्तक्षेप कर सकते हैं।

यह फैसला माननीय जस्टिस संदीप शर्मा द्वारा Pramod Kumar and Another v. Hir Chand मामले में सुनाया गया। मामला किन्नौर जिले के बस्तेरी गांव में स्थित खसरा नंबर 720 से जुड़े एक पारंपरिक रास्ते का था। शिकायतकर्ता हीरा चंद का कहना था कि याचिकाकर्ताओं ने उस रास्ते को बंद कर दिया था, जिसका उपयोग ग्रामीण, उनके पूर्वज और यहां तक कि स्थानीय देवता की शोभायात्रा भी दशकों से घरों, खेतों और श्मशान घाट तक पहुंचने के लिए करती रही है।

मामले की जांच के दौरान पुलिस ने पाया कि रास्ते में की गई रुकावट से शांति व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। इसके बाद मामला SDM, कल्पा के समक्ष पहुंचा। तहसीलदार की रिपोर्ट में भी यह पुष्टि हुई कि विवादित भूमि पर रास्ता मौजूद था और उसमें अवरोध पैदा किया गया था। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि स्थानीय रीति-रिवाजों के अनुसार किसी व्यक्ति को ऐसा रास्ता बंद करने का अधिकार नहीं है, जिसका उपयोग अन्य लोग अपने खेतों या आवश्यक स्थानों तक पहुंचने के लिए करते हों।

हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि SDM ने केवल रास्ते के उपयोग के मौजूदा अधिकार की रक्षा की है और कहीं भी भूमि के मालिकाना हक पर कोई फैसला नहीं दिया है। न्यायालय ने दोहराया कि मालिकाना हक से जुड़े विवादों का अंतिम निर्णय केवल सिविल कोर्ट ही कर सकती है। साथ ही, कोर्ट ने कहा कि SDM का आदेश तब तक प्रभावी रहेगा जब तक कोई सक्षम न्यायालय यह घोषित न कर दे कि संबंधित भूमि पर केवल याचिकाकर्ताओं का ही पूर्ण अधिकार और कब्जा है तथा अन्य ग्रामीणों को उसका उपयोग करने का कोई अधिकार नहीं है।

इस फैसले को ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक रास्तों के संरक्षण, सार्वजनिक उपयोग के अधिकारों और शांति व्यवस्था बनाए रखने के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल माना जा रहा है। यह निर्णय स्पष्ट करता है कि एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट का उद्देश्य मालिकाना हक तय करना नहीं, बल्कि ऐसे विवादों के कारण उत्पन्न होने वाली अशांति को रोकना और लंबे समय से चले आ रहे उपयोग के अधिकारों की रक्षा करना है।

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