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*CSIR-Institute of Himalayan Bioresource Technology को नई पहचान देने वाले पूर्व निदेशक डॉ. संजय कुमार की दूरदर्शी सोच को सलाम*

“डॉ. संजय कुमार की दूरदर्शी पहल से किसान और युवा उद्यमी हुए सशक्त”

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CSIR-Institute of Himalayan Bioresource Technology को नई पहचान देने वाले पूर्व निदेशक डॉ. संजय कुमार की दूरदर्शी सोच को सलाम!

Tct ,bksood, chief editor

पालमपुर की धौलाधार की वादियों में स्थित Council of Scientific and Industrial Research (सीएसआईआर) की प्रमुख प्रयोगशालाओं में से एक CSIR-IHBT को राष्ट्रीय स्तर पर नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने में पूर्व निदेशक डॉ. संजय कुमार की भूमिका उल्लेखनीय रही है। 11 जून 2015 से 28 फरवरी 2023 तक निदेशक के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने संस्थान को केवल एक शोध केंद्र तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे नवाचार, किसान हितैषी तकनीकों और वैज्ञानिक पर्यटन का मॉडल बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाए।
डॉ. संजय कुमार की दूरदर्शिता का सबसे आकर्षक उदाहरण IHBT परिसर में विकसित ट्यूलिप गार्डन है, जिसने पालमपुर को एक नई पहचान दी। यह केवल फूलों का बगीचा नहीं, बल्कि उच्च-मूल्य फ्लोरीकल्चर, अनुसंधान और जनसंपर्क का जीवंत केंद्र बन गया है। आज हजारों लोग यहाँ पहुँचकर न केवल ट्यूलिप की रंग-बिरंगी प्रजातियों का आनंद लेते हैं, बल्कि संस्थान की वैज्ञानिक उपलब्धियों से भी परिचित होते हैं। यह पहल दर्शाती है कि यदि शोध संस्थान समाज से जुड़ें तो वे जनभागीदारी और प्रेरणा के केंद्र बन सकते हैं।
अपने कार्यकाल में डॉ. कुमार ने सुगंधित एवं औषधीय पौधों पर शोध को विशेष प्राथमिकता दी। लैवेंडर, रोज़मेरी, लेमनग्रास और अन्य अरोमा फसलों की उन्नत किस्मों के विकास एवं प्रसार से हिमाचल सहित अन्य पर्वतीय राज्यों के किसानों को आय के नए अवसर मिले। “अरोमा मिशन” जैसी पहलों के माध्यम से हजारों किसानों को प्रशिक्षण, रोपण सामग्री और तकनीकी मार्गदर्शन उपलब्ध कराया गया, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिली और युवाओं के लिए स्वरोजगार के रास्ते खुले।
कोविड-19 वैश्विक महामारी के दौरान भी IHBT ने उनके नेतृत्व में महत्वपूर्ण योगदान दिया। संस्थान ने औषधीय पौधों और प्राकृतिक उत्पादों पर आधारित अनुसंधान के जरिए रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले उत्पादों पर कार्य किया और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समाज को जागरूक करने में भूमिका निभाई। यह दर्शाता है कि डॉ. कुमार का नेतृत्व केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं था, बल्कि समय की आवश्यकता के अनुरूप समाज के साथ खड़ा रहने वाला था।
उन्होंने संस्थान में अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं का सुदृढ़ीकरण, युवा वैज्ञानिकों को प्रोत्साहन, उद्योगों के साथ सहयोग तथा तकनीक हस्तांतरण की प्रक्रिया को भी गति दी। उनके कार्यकाल में कई प्रौद्योगिकियाँ उद्योगों को हस्तांतरित की गईं, जिससे शोध को व्यावसायिक सफलता में बदला जा सका। अंतरराष्ट्रीय सहयोग और राष्ट्रीय स्तर की परियोजनाओं में भागीदारी से IHBT की प्रतिष्ठा और सुदृढ़ हुई।

डॉ. संजय कुमार की सोच स्पष्ट थी—“विज्ञान समाज के लिए”। उन्होंने शोध को किसानों, उद्यमियों और आम नागरिकों तक पहुँचाने पर बल दिया। ट्यूलिप गार्डन जैसी पहल ने यह सिद्ध कर दिया कि वैज्ञानिक संस्थान केवल शोध पत्रों तक सीमित नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान के वाहक भी बन सकते हैं।
आज जब पालमपुर का नाम ट्यूलिप गार्डन और अरोमा मिशन जैसी पहलों से जोड़ा जाता है, तो उसमें डॉ. संजय कुमार की दूरगामी सोच और नेतृत्व की छाप स्पष्ट दिखाई देती है। ऐसे वैज्ञानिक और प्रशासक केवल सम्मान के पात्र ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत भी हैं। विज्ञान, कृषि और समाज को एक सूत्र में पिरोने वाले इस शोध-पुरुष का योगदान लंबे समय तक याद रखा.

File foto

जब से ट्यूलिप गार्डन की शुरुआत हुई है तब से लेकर आज तक इसमें लगातार सुधार किया जा रहा है तथा वैराइटीज को अपग्रेड करके इसे और भी शानदार बनाने की वर्तमान प्रशासन द्वारा कोशिश की जा रही है ताकि लोगों को ट्यूलिप के बारे में अधिक जानकारी मिल सके और लोग रोजगारोमुख खेती कर सकें!

 

 

 

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